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सिर्फ मोबाइल लोकेशन से साबित नहीं होती साथ मौजूदगी: इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पति की हत्या के आरोपी पत्नी व प्रेमी को किया बरी

ट्रायल कोर्ट की उम्रकैद की सजा रद्द: हाईकोर्ट ने कहा- मोबाइल टावर लोकेशन घटना के समय एक साथ होने का पुख्ता प्रमाण नहीं

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Allahabad High Court
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प्रयागराज। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने पति की हत्या के मामले में निचली अदालत द्वारा दोषी ठहराई गई पत्नी और उसके कथित प्रेमी को बरी कर दिया है। हाईकोर्ट ने महत्वपूर्ण टिप्पणी करते हुए स्पष्ट किया कि केवल मोबाइल फोन के कॉल डिटेल्स या टावर लोकेशन के आधार पर यह साबित नहीं किया जा सकता कि घटना के समय दो लोग एक ही स्थान पर साथ मौजूद थे।

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जस्टिस सिद्धार्थ वर्मा और जस्टिस जय कृष्ण उपाध्याय की खंडपीठ ने ट्रायल कोर्ट द्वारा 14 नवंबर 2025 को सुनाए गए फैसले को रद्द कर दिया। ट्रायल कोर्ट ने हसनेरा उर्फ शबाना और शाहरुख को हसनेरा के पति नईम की हत्या का दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी।

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क्या था पूरा मामला?

अभियोजन पक्ष के अनुसार, 1 जनवरी 2023 को शिकोहाबाद में एक ईंट भट्ठे के पास नईम की हत्या कर दी गई थी। पुलिस का आरोप था कि हसनेरा और शाहरुख के बीच अवैध संबंध थे और इसी के चलते दोनों ने साजिश रचकर नईम को मौत के घाट उतारा था। चूंकि मामले में कोई प्रत्यक्षदर्शी (Eye Witness) नहीं था, इसलिए पूरा केस परिस्थितिजन्य साक्ष्यों (Circumstantial Evidence) और मोबाइल कॉल डिटेल्स पर आधारित था।

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'मोबाइल टावर में एक साथ होना, एक जगह मौजूदगी का सबूत नहीं'

कॉल डिटेल्स पर अभियोजन के दावों को खारिज करते हुए हाईकोर्ट की खंडपीठ ने कहा कि मोबाइल टावर के एक ही दायरे में दो फोन का होना इस बात का सबूत नहीं है कि उनके यूजर वास्तव में एक ही जगह पर साथ थे।

अदालत ने कहा, "कॉल डिटेल्स से यह साबित नहीं होता कि दोनों व्यक्ति एक साथ मौजूद थे। कोई भी व्यक्ति अपना मोबाइल फोन किसी स्थान पर छोड़कर दूसरी जगह जा सकता है। कॉल डिटेल्स केवल मजबूत साक्ष्यों की पुष्टि में सहायक हो सकता है, लेकिन अकेले इसके आधार पर किसी को दोषी नहीं ठहराया जा सकता।"

पुलिस के सामने कबूलनामे और ईंट की बरामदगी पर भी सवाल

हाईकोर्ट ने पुलिस हिरासत में आरोपियों द्वारा दिए गए कथित कबूलनामे को भी साक्ष्य अधिनियम की धारा 26 का हवाला देते हुए खारिज कर दिया। कोर्ट ने कहा कि मजिस्ट्रेट की मौजूदगी के बिना पुलिस के सामने दिए गए बयान की कोई कानूनी मान्यता नहीं है।

इसके अलावा, घटना के वक्त इस्तेमाल खून से सनी जिस ईंट को हथियार बताया गया था, वह घटनास्थल से मिली थी न कि किसी आरोपी के कब्जे या निशानदेही पर।

संदेह का लाभ देकर किया बरी

अदालत ने माना कि अभियोजन पक्ष साक्ष्यों की ऐसी कोई ठोस कड़ी पेश करने में पूरी तरह नाकाम रहा, जो दोनों आरोपियों को सीधे अपराध से जोड़ सके। साक्ष्यों में कई महत्वपूर्ण कड़ियां गायब थीं। इसके चलते हाईकोर्ट ने दोनों आरोपियों को संदेह का लाभ (Benefit of Doubt) देते हुए तत्काल रिहा करने का आदेश जारी किया।