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इलाहाबाद हाईकोर्ट से UP कांग्रेस अध्यक्ष अजय राय को बड़ी राहत, निचली अदालत की कार्रवाई पर लगाई रोक

इलाहाबाद हाईकोर्ट ने कहा कि धारा 188 के तहत अपराध तभी बनता है जब अवज्ञा से किसी को बाधा, चोट या झगड़ा हुआ हो। सबूत न मिलने पर कांग्रेस प्रदेश अध्यक्ष अजय राय और अन्य पर दर्ज मुकदमे की संपूर्ण कार्यवाही रद्द की गई।

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Ajay Rai
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उत्तर प्रदेश। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एक अहम टिप्पणी (Allahabad High Court judgment) करते हुए कहा है कि धारा 188 आईपीसी के तहत अपराध तभी बनता है जब आदेश की अवज्ञा से किसी व्यक्ति को बाधा, झुंझलाहट, चोट पहुंची हो या दंगा-झगड़ा हुआ हो। केवल निषेधाज्ञा का उल्लंघन करना पर्याप्त नहीं है। इस आधार पर कोर्ट ने कांग्रेस के प्रदेश अध्यक्ष और पूर्व विधायक अजय राय तथा अन्य पर दर्ज मुकदमे की संपूर्ण कार्यवाही को रद्द (Ajay Rai case quashed) कर दिया। यह आदेश न्यायमूर्ति समीर जैन की एकलपीठ ने दिया।
मामला क्या था?
वाराणसी के कोतवाली थाने में 20 सितंबर 2017 को अजय राय और अन्य पर निषेधाज्ञा उल्लंघन का मुकदमा (Section 188 IPC violation) दर्ज हुआ था। आरोप था कि उन्होंने प्रशासनिक आदेश के बावजूद राजनीतिक जुलूस निकाला। इस जुलूस में समाजवादी पार्टी के पूर्व मंत्री सुरेंद्र पटेल, कांग्रेस के पूर्व सांसद डॉ. राजेश मिश्रा, अनिल श्रीवास्तव समेत लगभग 500 लोगों पर मुकदमा दर्ज किया गया था।
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ट्रायल कोर्ट में वर्ष 2017 में पुलिस ने चार्जशीट दाखिल की थी और 2019 में इस पर संज्ञान लेकर समन आदेश जारी किया गया। इसके खिलाफ अजय राय ने हाईकोर्ट में याचिका दायर की और संपूर्ण कार्यवाही रद्द करने की मांग की।

अजय राय की दलील

अजय राय के अधिवक्ता ने कोर्ट में दलील दी कि यह मुकदमा राजनीतिक बदले की भावना से दर्ज किया गया है। धारा 188 में अपराध तभी साबित होता है जब आदेश उल्लंघन से किसी को बाधा, नुकसान या चोट पहुंचे। पुलिस रिपोर्ट में ऐसा कोई आधार नहीं है, इसलिए संज्ञान लेना अवैध है।
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वहीं, राज्य सरकार के अधिवक्ता ने कहा कि पुलिस अधिकारियों के अनुरोध के बावजूद प्रदर्शन जारी रहा, जिससे यह माना जा सकता है कि सार्वजनिक सेवक को बाधा या झुंझलाहट हुई।
हाईकोर्ट का फैसला
हाईकोर्ट ने कहा कि केवल निषेधाज्ञा उल्लंघन पर्याप्त नहीं है। जब तक यह साबित न हो कि अवज्ञा से किसी को वास्तविक बाधा, नुकसान या झगड़ा हुआ है, तब तक धारा 188 का अपराध नहीं बनता। रिकॉर्ड के अनुसार ऐसा कोई तथ्य सामने नहीं आया, इसलिए कोर्ट ने संपूर्ण कार्यवाही को रद्द कर दिया।
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