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आईडीबीआई बैंक की 5.6 अरब डॉलर की बिक्री से केंद्र सरकार को तेल कीमतों के मोर्चे पर मिली बड़ी राहत

7 साल में पहली बार एसेट-सेल से जुटाया गया पैसा वार्षिक लक्ष्य से अधिक; कच्चे तेल की बढ़ती कीमतों के बीच राजकोषीय घाटे को नियंत्रित करने में मिलेगी मदद

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नई दिल्ली (भदैनी मिरर)। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार को लंबे समय से प्रतीक्षित आईडीबीआई बैंक (IDBI Bank) की बिक्री से बड़ी वित्तीय राहत मिलने जा रही है। ऐसे समय में जब वैश्विक स्तर पर कच्चे तेल (Crude Oil) की कीमतें आसमान छू रही हैं और विदेशी पूंजी की निकासी से अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ रहा है, यह सौदा सरकार के लिए किसी बड़े बूस्टर से कम नहीं है।

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7 साल में पहली बार एसेट-सेल का वार्षिक लक्ष्य पार

5.6 अरब डॉलर (लगभग) का यह बड़ा सौदा पिछले सात वर्षों में पहली बार सरकार के एसेट-सेल (संपत्ति बिक्री) के वार्षिक लक्ष्य को पार कर जाएगा। अर्थशास्त्रियों का मानना है कि यह एकमुश्त विंडफॉल (अचानक मिलने वाला लाभ) सरकार को 100 डॉलर प्रति बैरल से अधिक के क्रूड ऑयल के झटके से आम जनता को बचाने के लिए कुशन प्रदान करेगा, वह भी 4.3 प्रतिशत के राजकोषीय घाटे (Fiscal Deficit) के लक्ष्य को जोखिम में डाले बिना। हालांकि, यदि कच्चे तेल की कीमतें लंबे समय तक उच्च बनी रहीं, तो यह राहत अल्पकालिक भी साबित हो सकती है।

इन्ड्सइंड बैंक के अर्थशास्त्री गौरव कपूर के अनुसार, "यह हिस्सेदारी बिक्री सरकार के खजाने को बढ़ावा देगी। इससे सरकार को अपने घाटे के लक्ष्यों को आराम से पूरा करने में मदद मिलेगी, साथ ही लंबे समय तक ईंधन सब्सिडी जारी रखने के लिए पर्याप्त धन भी मिलेगा।"

बढ़ते तेल आयात और राजकोषीय दबाव

भारत अपनी कच्चे तेल की जरूरतों का लगभग 90 प्रतिशत आयात करता है, जिससे वह वैश्विक कीमतों में उतार-चढ़ाव के प्रति अत्यधिक संवेदनशील हो जाता है। बढ़ती लागत के बावजूद सरकारी तेल खुदरा विक्रेताओं ने पंप की कीमतें स्थिर रखी हैं, जबकि सरकार पहले ही ईंधन करों में कटौती कर चुकी है।

आईसीआरए (ICRA) की रिपोर्ट के अनुसार, इन उपायों से सरकारी वित्त पर असर पड़ रहा है। चालू वित्त वर्ष के पहले पांच महीनों में उत्पाद शुल्क (Excise Duty) संग्रह में 23 प्रतिशत की गिरावट आई है, और राजकोषीय घाटा 7.1 ट्रिलियन रुपये तक पहुंच गया है। हालांकि, मजबूत अर्थव्यवस्था और 15.2 प्रतिशत की वृद्धि के साथ प्रत्यक्ष कर संग्रह (Direct Tax Collection) से कुछ हद तक राहत मिल रही है।

निजीकरण कार्यक्रम में बड़ी सफलता

यह सौदा भारत के निजीकरण कार्यक्रम के लिए एक महत्वपूर्ण सफलता का प्रतीक है, जो पिछले कुछ वर्षों में लगातार अपने बजट लक्ष्यों से पीछे रह गया था। नई दिल्ली ने इस वित्तीय वर्ष में हिस्सेदारी बिक्री और संपत्ति मुद्रीकरण से 80,000 करोड़ रुपये जुटाने का लक्ष्य रखा था।

हालांकि, अर्थशास्त्रियों का कहना है कि यह राजस्व कर राजस्व की तरह हर साल नहीं आता, बल्कि यह एक बार का लाभ है। यदि वैश्विक तेल की कीमतें लंबी अवधि तक ऊंची बनी रहीं, तो यह राजकोषीय बफर कमजोर पड़ सकता है, खासकर यदि सरकार उपभोक्ताओं को महंगे ईंधन से बचाना जारी रखती है। एम्ब्रे से लेकर एलारा कैपिटल तक के अर्थशास्त्रियों का सुझाव है कि सरकार को सतत विकास और राजकोषीय प्राथमिकता के बीच संतुलन बनाने के लिए रणनीतिक विनिवेश पर ध्यान केंद्रित रखना होगा।