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भारतीय शेयर बाजार से FPI का मोहभंग: सितंबर में विदेशी निवेशकों ने निकाले ₹20,974 करोड़, 2026 में अब तक ₹2.45 लाख करोड़ की रिकॉर्ड बिकवाली

अमेरिकी बॉन्ड यील्ड, महंगा क्रूड ऑयल और कमजोर रुपया बने वजह; जानिए किन 3 बड़े कारणों से भारतीय इक्विटी और डेट मार्केट से बाहर निकल रहा विदेशी पैसा

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नई दिल्ली / भदैनी मिरर: वैश्विक स्तर पर बढ़ती अनिश्चितताओं, अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ऊंची ब्याज दरों, चढ़ते कच्चे तेल के भाव और डॉलर के मुकाबले ऐतिहासिक निचले स्तर पर पहुंचे भारतीय रुपये के कारण विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक (FPI) एक बार फिर बिकवाल बन गए हैं। सीडीएसएल (CDSL) के ताजा आंकड़ों के अनुसार, सितंबर महीने में 18 तारीख तक विदेशी निवेशकों ने भारतीय शेयर बाजार (इक्विटी) से ₹20,974 करोड़ की भारी रकम वापस निकाल ली है।

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यह बिकवाली ऐसे समय में आई है, जब जुलाई (₹20,200 करोड़) और अगस्त (₹29,630 करोड़) में विदेशी निवेशकों की वापसी से बाजार में मजबूती दिखी थी। हालांकि, राहत की बात यह है कि प्राइमरी मार्केट (IPO) के जरिए विदेशी निवेश का प्रवाह अभी भी बना हुआ है।

2026 में बिकवाली का आंकड़ा ₹2.45 लाख करोड़ पार

सितंबर की इस तेज निकासी के बाद, वर्ष 2026 में अब तक विदेशी पोर्टफोलियो निवेशक भारतीय इक्विटी मार्केट से कुल ₹2.45 लाख करोड़ से अधिक की पूंजी निकाल चुके हैं। यह आंकड़ा पूरे वर्ष 2025 में हुई कुल ₹1.66 लाख करोड़ की निकासी से कहीं अधिक है, जो बाजार के लिए चिंता का विषय बना हुआ है।

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विदेशी निवेशकों के पीछे हटने के 3 मुख्य कारण:

  1. अमेरिका में ऊंची ब्याज दरें और मजबूत बॉन्ड यील्ड:

    अमेरिकी फेडरल रिजर्व द्वारा ब्याज दरों को बढ़ाकर 3.75-4.00% किए जाने से भारत और अमेरिका के बीच यील्ड का अंतर कम हो गया है। इससे विदेशी निवेशकों के लिए भारतीय बाजार की तुलना में अमेरिकी संपत्तियां ज्यादा सुरक्षित और आकर्षक नजर आ रही हैं।

  2. कच्चे तेल (Crude Oil) की आसमान छूती कीमतें:

    मध्य पूर्व (ईरान-अमेरिका तनाव) में बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के चलते ब्रेंट क्रूड ऑयल $100 प्रति बैरल के पार बना हुआ है। भारत अपनी जरूरत का बड़ा हिस्सा आयात करता है, जिससे देश के आयात बिल और मुद्रास्फीति (महंगाई) पर सीधा दबाव पड़ रहा है।

  3. रुपये में ऑल-टाइम लो की गिरावट:

    डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया लगातार कमजोर हो रहा है। हाल ही में रुपये में 1.1% की बड़ी साप्ताहिक गिरावट दर्ज की गई और यह 95.92-95.96 के निचले स्तर को छूते हुए इंट्रा-डे में ₹96 प्रति डॉलर का स्तर भी पार कर गया।

विशेषज्ञों की राय: 'यह भारत नहीं, क्रूड और डॉलर की कहानी है'

चॉइस वेल्थ के मुख्य निवेश रणनीति अधिकारी धीरज गौड़ और 'ट्रैक' के सीईओ वेदांत गुप्ते के अनुसार, यह बिकवाली भारत के बुनियादी आर्थिक ढांचे (Fundamentals) की कमजोरी नहीं, बल्कि वैश्विक मैक्रो-इकनॉमिक दबावों का नतीजा है। जब भी कच्चा तेल महंगा होता है और अमेरिकी बॉन्ड यील्ड मजबूत होती है, तो इमर्जिंग मार्केट्स से पैसा बाहर निकलता है।

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जियोजित इन्वेस्टमेंट्स के मुख्य निवेश रणनीतिकार वी. के. विजयकुमार ने बताया कि आगे FPI का रुख मिडिल ईस्ट के तनाव और तेल की कीमतों पर निर्भर करेगा। हालांकि, भारतीय कंपनियों की बेहतर आय वृद्धि (Earnings Growth) और मजबूत घरेलू अर्थव्यवस्था दीर्घकालिक निवेशकों के लिए सकारात्मक पहलू हैं।

डेट मार्केट (Debt Market) से भी निकाला पैसा

केवल शेयर बाजार ही नहीं, बल्कि विदेशी निवेशकों ने समीक्षाधीन अवधि के दौरान भारतीय डेट मार्केट से भी दूरी बनाई है। उन्होंने:

  • फुली एक्सेसिबल रूट (FAR): ₹10,296 करोड़

  • वॉलंटरी रिटेंशन रूट (VRR): ₹1,817 करोड़

  • जनरल रूट: ₹1,068 करोड़

की कुल निकासी की है।