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आम FIR दर्ज होना हथियार लाइसेंस खारिज करने की वजह नहीं: पटना हाईकोर्ट का बड़ा फैसला

अदालत ने पटना डीएम और कमिश्नर के आदेश को किया रद्द; कहा— केवल आपराधिक केस का हवाला देकर बिना ठोस आधार के आर्म्स लाइसेंस नहीं रोका जा सकता।

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कानूनी डेस्क (भदैनी मिरर): पटना हाईकोर्ट ने शस्त्र (हथियार) लाइसेंस जारी करने को लेकर एक बेहद महत्वपूर्ण और नजीर बनने वाला फैसला सुनाया है। उच्च न्यायालय ने साफ कहा है कि किसी आवेदक के खिलाफ महज आम एफआईआर (FIR) दर्ज होने या किसी आपराधिक मामले में नाम शामिल होने के आधार पर हथियार का लाइसेंस देने से पूरी तरह इनकार नहीं किया जा सकता।

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जस्टिस आलोक कुमार की एकल पीठ ने स्पष्ट किया कि लाइसेंस खारिज करने के लिए हथियार के गलत इस्तेमाल, हिंसा की संभावना या सार्वजनिक सुरक्षा को सीधे खतरे का ठोस व पुख्ता सबूत होना अनिवार्य है।

क्या था पूरा मामला?

'बिग्रहपुरम डेवलपर्स प्राइवेट लिमिटेड' के निदेशक व बिल्डर ने नॉन-प्रोहिबिडेड बोर (NPB) रिवॉल्वर/पिस्टल के लाइसेंस आवेदन को खारिज किए जाने के खिलाफ हाईकोर्ट में याचिका दायर की थी:

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  • आवेदक का तर्क: 17 जनवरी 2023 को दिए आवेदन में उन्होंने अपनी जान और संपत्ति का खतरा बताते हुए कहा था कि काम के सिलसिले में उन्हें अक्सर दिन-रात यात्रा करनी पड़ती है। जक्कनपुर SHO और पटना SSP ने उनके पक्ष में सकारात्मक रिपोर्ट दी थी।

  • प्रशासन का फैसला: इसके बावजूद पटना के जिलाधिकारी (DM) ने रामकृष्णा नगर थाने में दर्ज एक पेंडिंग मुकदमे का हवाला देकर अर्जी खारिज कर दी। इस फैसले पर पटना के डिविजनल कमिश्नर ने भी मुहर लगा दी थी।

  • बरी होने के बाद भी मिला झटका: याचिकाकर्ता के अनुसार, जिस केस का हवाला देकर आवेदन निरस्त किया गया था, उसमें कोर्ट (ACJM-XIII) ने उन्हें 23 फरवरी 2024 को ही सभी आरोपों से बरी (Acquit) कर दिया था। इसके बाद भी कमिश्नर ने राहत नहीं दी।

हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी: 'अंदाज़ों पर नहीं, तथ्यों पर हो फैसला'

मामले की सुनवाई करते हुए जस्टिस आलोक कुमार की पीठ ने कहा कि भारत में हथियार रखना कोई मौलिक अधिकार नहीं है, बल्कि आर्म्स एक्ट, 1959 के तहत दी जाने वाली एक विनियमित (Regulated) सुविधा है। हालांकि, इस अधिकार का इस्तेमाल विवेक और पक्के तथ्यों के आधार पर होना चाहिए, न कि केवल अंदाज़ों या पूर्वाग्रह के आधार पर।

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कोर्ट ने कहा:

"आवेदक के खिलाफ सिर्फ किसी मामले में शामिल होने या सामान्य FIR दर्ज होने के आधार पर लाइसेंस रद्द करना या देने से मना करना न्यायसंगत नहीं है, जब तक कि हथियार का गलत इस्तेमाल या सार्वजनिक सुरक्षा के लिए सीधा खतरा साबित न हो।"

पटना डीएम को 3 महीने के भीतर पुनर्विचार का आदेश

हाईकोर्ट ने पाया कि जब डिविजनल कमिश्नर ने खारिज करने के आदेश की पुष्टि की, उससे पहले ही याचिकाकर्ता केस से बरी हो चुका था। इसलिए कोर्ट ने पटना के जिलाधिकारी और डिविजनल कमिश्नर दोनों के पुराने आदेशों को रद्द (Quash) कर दिया।

अदालत ने पटना डीएम को निर्देश दिया है कि याचिकाकर्ता के बिल्डर और व्यवसायी होने तथा उनकी सुरक्षा की जरूरतों को ध्यान में रखते हुए, नई पुलिस रिपोर्ट मंगाकर तीन महीने के भीतर उनके हथियार लाइसेंस आवेदन पर नियमनुसार पुनः विचार करें।