Movie prime
Ad

बिहार के सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव को तीनों मामले में मिली जमानत

तीन दिन पहले की गई थी गिरफ्तारी, अदालत में अभियोजन ने किया जमानत का विरोध

Ad

 
Pappu yadav
WhatsApp Group Join Now

Ad

अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने, पत्रावलियों के अवलोकन के बाद मंजूर कर ली जमानत

पटना। पटना की एमपी-एमएलए विशेष अदालत ने बिहार में पूर्णिया निर्वाचन क्षेत्र का प्रतिनिधित्व करने वाले सांसद राजेश रंजन उर्फ पप्पू यादव को बड़ी राहत देते हुए उनके खिलाफ दर्ज तीनों मामलों में जमानत दे दी है। शुक्रवार को हुई सुनवाई के दौरान बचाव पक्ष और अभियोजन पक्ष की दलीलें सुनने के बाद अदालत ने जमानत याचिका स्वीकार कर ली। अदालत के इस निर्णय के बाद उनके समर्थकों में उत्साह का माहौल है। राजनीतिक हलकों में भी इसकी चर्चा हो रही है। गौरतलब है कि वर्ष 1995 के एक मामले में पटना पुलिस ने उन्हें बीते शुक्रवार की रात को गिरफ़्तार किया था. वो इस समय पटना के बेउर जेल में बंद हैं।

Ad
Ad

एमपी-एमएलए विशेष अदालत में पप्पू यादव के खिलाफ दर्ज मामलों की सुनवाई हुई। बचाव पक्ष की ओर से कहा गया कि आरोपों का स्वरूप गंभीर नहीं है और अभियुक्त जांच में सहयोग कर रहे हैं। न्यायिक हिरासत में रखने की आवश्यकता नहीं है। दूसरी ओर अभियोजन पक्ष ने जमानत का विरोध करते हुए दलील दी कि मामले की निष्पक्ष सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए सख्ती आवश्यक है और उसने जमानत याचिका खारिज करने का आग्रह किया। हालांकि, कोर्ट ने दोनों पक्षों की दलीलों को सुनने और पत्रावलियों के अवलोकन के बाद जमानत मंजूर कर ली। आपको बता दें कि पप्पू यादव के खिलाफ तीन अलग-अलग तिथियों में मामले दर्ज किए गए थे। इनमें कोतवाली थाना कांड भी शामिल है। पप्पू यादव को अदालत ने शर्तों के साथ जमानत दी है। अदालत के आदेश के बाद पप्पू यादव की रिहाई की प्रक्रिया शुरू हो गई है।

Ad

सीएम नीतीश कुमार को लिखा था पत्र, क्या वैचारिक लड़ाई को निजी बनाया जाना सही है? 

आपको यह भी बता दें कि गिरफ्तारी के बाद पप्पू यादव ने बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार को एक लंबी चिट्ठी लिखी थी, जो सोशल मीडिया पर वायरल हुआ था। इस पत्र को उनके फ़ेसबुक पेज पर साझा किया गया था। पत्र में लिखा था कि नीतीश बाबू मुझसे किस बात का बदला लेना चाह रहे हैं, जबकि मैंने उनसे उनके 20 साल के कार्यकाल में कोई मदद तक नहीं मांगी। न ही मैंने कभी शकुनी जी और सम्राट जी की व्यक्तिगत आलोचना की। लेकिन हम ज़रूर जानना चाहेंगे कि क्या वैचारिक लड़ाई को निजी बनाया जाना सही है?

Ad
Ad