सदियों की परम्परा का निर्वहन करता है “डोम परिवार”

                             

आजाद भारत के छठवें डोमराजा हैं 15 वर्षीय हरिओम नारायण चौधरी

शेरावाली कोठी में रहता है डोमराजा परिवार, कालू डोम से शुरू हुई परम्परा

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वाराणसी, भदैनी मिरर। सनातन परंपरा में विश्वास रखने वाला हर मनुष्य जीवन की सत्यता से रुबरु है। चिर निद्रा में सोए हर व्यक्ति को अंतिम यात्रा पर जाना है और मोक्ष के लिए डोम समाज के अग्नि की आवश्यकता होती है। धर्म ने हमें ऐसे सामाजिक व्यवस्थाओं से बांध रखा है जिसका निर्वहन हमें गौरवान्वित महसूस कराता है। डोम समाज एक ऐसा वर्ग है जिससे लोग दूरी बनाएं रखना चाहते है, लेकिन काशी में उसी डोम को राजा की भी उपाधि मिली, और 250 वर्ष पुरानी परंपरा आज भी जीवित है। पिछले दिनों डोम राजा परिवार के पांचवें राजा जगदीश चौधरी के निधन के बाद उस विरासत को बचाएं रखने और परंपरा को आगे बढ़ाने के लिए आजाद भारत में छठे डोम राजा के रूप में 15 साल के हरिओम नारायण चौधरी की ताजपोशी हुई।

पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही परम्परा

देश को आजादी मिलने के बाद वर्ष 1966 में अचानक रातों रात देश की अलग-अलग रियासतों के राजा, कुंवर, नरेश की गद्दी और तमगा छिन गया। सभी के नाम के आगे पूर्व लग गया. बावजूद इसके, देश में एकलौती गद्दी और राजा का एकलौता तमगा काशी के डोम राजा के पास सुरक्षित रहा। तब से अब तक काशी के महाश्मसान के मालिक और कालू डोम के वंशज डोम राजा बने रहे। वैसे परम्परा से भी प्राचीन और इतिहास से भी पुरातन काशी में डोम राजा की परंपरा पौराणिक मान्यता के अनुसार अनादि काल से है। लेकिन वर्तमान में डोमराज परिवार जो शेरावाली कोठी में रहता है इनकी करीब 250 साल की परम्परा कालू डोम से मानी जाती है। स्वतंत्रता संघर्ष और आज़ादी के बाद के दौर में स्वर्गीय देवी चौधरी और स्वर्गीय लक्ष्मी नारायण चौधरी डोमराजा रहें। बाद में लक्ष्मी नारायण चौधरी राजा हुए। 25 साल पहले जब उनकी मृत्यु हुई तब उनके बेटे कैलाश चौधरी डोमराजा हुए। कैलाश चौधरी के बाद उनके पुत्र रंजीत चौधरी डोमराजा बनें। तीन साल पहले ही जगदीश चौधरी राजा बने। उनकी मौत के बाद ये गद्दी उनके बेटे हरिओम नारायण चौधरी संभाल रहे है।

शिव देते हैं तारकमंत्र, डोम परिवार देता है मोक्ष की आग

काशी के दो श्मशान मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाटों की जिम्मेदारी संभालना एक बड़ी चुनौती है। हिंदू मान्यताओं के मुताबिक, काशी में मरने और यहां अंतिम संस्कार होने पर जीवात्मा को खुद भगवान शिव तारक मंत्र प्रदान करते हुए मोक्षगति देते हैं। यहां मोक्ष की आग डोम परिवार ही देता है। जिसके लिए परिजनों को डोम कर देना पड़ता है। खुद दिवंगत डोम राजा जगदीश चौधरी के दाह संस्कार के लिए कर चुकाना पड़ा था। यही नहीं, महान सत्यवादी राजा हरिश्चंद्र को डोम परिवार के वंशज कालू डोम ने खरीदा था और जब राजा हरिश्चंद्र के पुत्र का शव यहां घाट पर आया तो राजा हरिश्चंद्र ने अपनी पत्नी से भी कर मांगा था।

नाल जोड़ी फेरने की है परंपरा

काशी के डोम राजा परिवार में पहलवानी भी परंपरागत चली आ रही है। मान मंदिर घाट स्थित घर में ही पुश्तैनी अखाड़ा बना हुआ है। अखाड़े में पांच कुंतल से लेकर 30 कुंतल तक के नाल है, जिसे सैकड़ों साल पुराना बताया जाता है। ये डोम राजा परिवार का पहलवानी के प्रति लगाव और शारिरिक बल की कहानी बयां करता है। आज के जमाने में पहलवान कुंतल वजन ही उठा पाता है, लेकिन ऐसा कहा जाता है कि डोम राजा के पूर्वज 30 कुंतल वजनी नाल भी उठाया करते थे। परिवार के अखाड़े का आकर्षण है कांटे वाली जोड़ी जो कभी देश भर के पहलवानों के लिये बड़ी चुनौती का सबब रही है। परिवार में राजा की गद्दी संभालने वाला हर व्यक्ति कांटे वाली जोड़ी फेरता चला आ रहा है। यह 40 किलो वजन वाली नाल है, जिसे लगातार 352 हाथ फेरने का कीर्तिमान भी स्व. जगदीश चौधरी के नाम है।

ये हैं मान्यताएं

कालू जब बन गए डोम

हिन्दू पौराधिक कथाओं के अनुसार एक बार भगवान शिव और माता पार्वती काशी आए। मणिकर्णिका घाट के पास स्नान करते समय उनका कुंडल गिर गया। उसे कालू नाम के एक व्यक्ति ने छिपा लिया। कालू को कुछ लोग राजा तो कुछ ब्राह्मण बताते हैं। ऐसी मान्यता है कि तलाश करने पर भी जब कुंडल नहीं मिला तो भगवान शिव ने क्रोधित होकर कुंडल को अपने पास रखने वाले को नष्ट हो जाने का श्राप दे दिया। कालू ने आकर क्षमा याचना की तो भगवान शिव ने अपना श्राप वापस लेकर उसे श्मशान का राजा बना दिया। तभी से कालू के वंश का नाम डोम पड़ गया।

हरिश्चंद्र ने मांगा था पुत्र के लिए कर

डोम जाति से जुड़ी एक और मान्यता बतायी जाती है कि महादानी राजा हरिश्चन्द्र की कोई संतान नहीं थी। भगवान वरुण ने आशीर्वाद दिया तो उनको रोहितास नाम का एक बेटा हुआ। ऋषि विश्वामित्र ने एक बार उनकी परीक्षा लेने के लिये उनसे पूरा राजपाठ ही मांग लिया। हरिश्चन्द्र ने दे दिया। विश्वामित्र ने और दान मांगा तो उन्होंनेे अपने आपको वाराणसी के एक डोम के हाथों बेच दिया, जबकि पत्नी और बेटो को एक ब्राह्मण को बेचा। बेटे रोहितास की सांप काटने से मौत हो गई तो उनकी पत्नी अंतिम संस्कार के लियेेे घाट पर गई। हरिश्चन्द्र बेटे के अंतिम संस्कार के लिये भी कर मांगे थे।

             

         

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