तुलसीघाट: राम बिन सूनी हुई आयोध्या, निषाद मिलन देख नम हुई आँखें…

                             

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वाराणसी, भदैनी मिरर।तुलसीघाट की रामलीला के तीसरे दिन वनगमन और निषाद मिलन की लीला का मंचन हुआ। लीला में कैकेई के कोपभवन जाते ही राज्याभिषेक से राजा दशरथ कैकेई से मिलने पहुंचते है। जैसे ही कैकेयी राजा को वचन याद दिलाते हुए राम को चौदह वर्ष का वनवास और भरत को राज्य का वरदान मांगा तो दशरथ के होश उड़ गए। उनकी खुशियों पर मानों वज्रपात हो गया। भगवान राम जैसे ही वन के लिए प्रस्थान किए तो लीलाप्रेमियों की आंखों से आंसू छलक पड़े। शुक्रवार को लीला मंचन के दृश्य में विचारमग्न सीता को देख भगवान राम कहते हैं कि यह समय सोचने का नहीं है। शीघ्र वन चलने की तैयारी करो। सीता अपनी सास कौशल्या का पैर पकड़कर कहती हैं कि मैं बहुत ही अभागन हूं। जब सेवा करने का मौका आया तब वन जाना पड़ रहा है। कौशल्या ने सीता को आशीर्वाद दिया।

उधर, राम के वन जाने की खबर सुनकर लक्ष्मण आते हैं और वह भी पिता दशरथ से वन जाने की आज्ञा मांगते हैं। दशरथ जी सीता से कहते हैं कि वन में तुम्हें बहुत कष्ट होगा। तुम वहां कैसे रहोगी। सीता संकोचवश कोई उत्तर नहीं दे पातीं। इतने में कैकेयी तिलमिलाती हुई आती हैं और मुनियों का वस्त्र राम के आगे रख देती हैं। कैकेयी राम से कहती हैं कि तुम राजा के प्राण हो तुम्हारा शील और स्नेह छोड़ने से वो डरते हैं। कैकेयी की यह बात राजा दशरथ को बाण की तरह लगती है। राम वशिष्ठ के पास पहुंचकर सबको विकल देख समझाते हैं। कहते हैं कि सब लोग महाराज की सेवा करते रहिए हम शीघ्र आएंगे। राम वन की ओर निकल पड़ते हैं। सुमंत रथ लेकर राम को बैठाने के लिए जाते हैं लेकिन सबको वापस होना पड़ता है। राम के बिना अयोध्या सूनी हो जाती है। भगवान की पहली रात तमसा नदी के किनारे कटती है। सुबह होने पर राम, सीता और लक्ष्मण शृंगवेरपुर पहुंच जाते हैं जहां पर निषाद से मिलन होता है। स्वरूपों की आरती महंत प्रो. विश्वंभर नाथ मिश्र ने उतारी।

             

         

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