उफ्फ..! यह सन्नाटा

                             

  Ford Hospital                           


दो दिन पहले से शहर की सजी दुकानें, सप्ताह भर पहलें से स्कूलों की तैयारियां, छात्रों का सांस्कृतिक कार्यक्रमों को लेकर उत्साह, पुलिस लाइन से लेकर विश्वविद्यालयों की परेड़ और सलामी लेते अतिथिगण और दर्शक दीर्घा में बैठी जनता जवानों के बूट और गगनचुम्बी नारों से अपना रोम-रोम देशभक्ति के रंग में रंग लेती है। राष्ट्रीय पर्वों के दिन जगह-जगह बजते देशभक्ति गाने कानों के रास्ते हृदय में उतर कर जोश भरते है। आजादी के दीवानों को नमन करने और उनके बलिदान को याद कर देशभक्ति का शपथ लेने का सुनहरा अवसर होता है। भारत के संविधान की खूबसूरती इस लोकतांत्रित देश मे स्कूल-कॉलेज, संगठन से लेकर सरकारी कार्यालयों पर हमारे विराट त्याग और बलिदान को दर्शाता शान से फहरता तिरंगा ही है। आजादी के बाद यह पहला मौका है जब काशी में यह सन्नाटा घुटन पैदा कर रही है। एक-दो मर्तवा ऐसा हुआ जब कुछ मोहल्ले अराजकतत्वों की भेंट चढ़ गए और उन मोहल्लों में कर्फ्यू सा माहौल हो गया था। इस वर्ष सादगी के साथ सांकेतिक कार्यक्रम कर रस्मअदायगी कर ली गई मगर वह एहसास व जोश और उमंग नहीं दिखी।

यह वही काशी है जब आजादी मिलने की खुशी में डूब गई थी, जिस वर्ष आजादी मिली उस वर्ष रात 12 बजते ही मुंगलसराय से सैकड़ों ट्रेनों ने एक साथ हॉर्न बजाया और आवाज वाराणसी तक आ पहुंची, कभी न ठहरने और शांत रहने वाली काशी इस वर्ष शांत है, चुनौती है जनता की जान बचाने की। हर कोई एक दूसरे को लेकर सशंकित है कि कही कोई संक्रमित तो नहीं? आजादी के जश्न में यहां के हलवाईयों की भूमिका भी कम न थी, तीन रंगों वाली बर्फी आज भी याद की जाती है। जहां का बच्चा-बच्चा देशभक्ति गानों को गुनगुनाता, आजादी के दीवानों को याद करता हुआ उनको आत्मसात करता है वहां आज सन्नाटा है, न रैली है और न ही वह जोश। शैक्षिणक संस्थान बन्द होने से सब फीका-फीका लग रहा है। जो स्कूलों की झांकियां  इतिहास के पन्नों से निकल जीवंतता का प्रमाण देने लगती है, वह भी लापता है। सच मायने में हम राष्ट्रीय पर्वों पर ही शहीदों को याद करते है और उनकी वीरता को सलाम करते है, होना तो यह चाहिए कि शहीदों को हम रोज याद करें। हमारे आजादी के दीवानें एक दिन के ही मोहताज क्यों..? कुछ लोगों के तथ्य यह भी होंगे कि वह हर रोज शहीदों को याद करते है, मगर हकीकत तो यह है कि अक्सर संस्थानों-कार्यालयों से तिरंगे के उल्टे फहराने की भी खबरें आती है। आइये संकल्प लें, समय ने करवट बदला है हर वर्ष हम मनचाहे तरीके से जश्न-ए-आजादी नहीं मना सकते तो हम हर रोज शहीदों को नमन करें और अपने खुशियों के साथ उनकी यादें साझा करें।
अवनिन्द्र कुमार सिंह

             

         

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *