कोविड-19 से समाज में वैज्ञानिक स्वभाव के प्रादुर्भाव की संभावना

                             

मदन मोदन मालवीय टेक्निकल यूनिवर्सिटी के पूर्व कुलपति प्रो ओंकार सिंह के विचार

  Ford Hospital                           

वाराणसी, भदैनी मिरर। कोरोना वायरस के संक्रमण से पूरी दुनिया डरी-सहमी है। विश्व स्वास्थ्य संगठन से लेकर संयुक्त राष्ट्र व भारत समेत तमाम देश इस वैश्विक महामारी से लड़ने के लिए तमाम तरह के उपाय कर रहे हैं। लेकिन एक बाद जो सामने आई है या आ रही है, वो यह कि सब कुछ के बावजूद पूरी दुनिया वैज्ञानिकता और तार्किकता को ही इस संकट की घड़ी में महत्व दे रही है। पारंपिक ढोंग, पाखंड, रुढ़ियों को दरकिनार कर दिया गया है। सरकारें भी सचेत हैं कि ऐसा कुछ भी प्रचारित या प्रसारित न हो जिससे जीवन संकट में पड़ जाए। ऐसे में यह पूरी तरह से तय हो गया है कि संकट का सामना पाखंड या ढोंग से नहीं वैज्ञानिक तर्कों के आधार पर ही हो सकता है। लिहाजा विज्ञान और तकनीकि से जुड़े लोगों ने इस पर खुशी जाहिर करते हुए यह कहाना शुरू कर दिया है कि कोविड-19 से समाज में वैज्ञानिक स्वभाव के प्रादुर्भाव की संभावना बढ़ी है।
प्रस्तुत है एक तकनीकी वैज्ञानिक की सोच पर आधारित यह लेख…

वैश्विक स्तर पर विश्व स्वास्थ्य संगठन के कोरोना वायरस से फैलने वाली बीमारी कोविड-19 को महामारी घोषित करने के बाद से दुनिया के तमाम देशों ने अपनी आबादी को बचाने के व्यापक प्रयास प्रारंभ कर दिए हैं। विगत में भारत में भी प्रधानमंत्री के आह्वान पर देश में प्रभावी तरीके से जनता कर्फ्यू का अनुपालन किया गया। इसी के साथ उसी दिन सायंकाल कोरोना वायरस से फैलने वाली महामारी से बचाव में लगे लोगों के प्रति सामूहिक आभार व्यक्त करने की कार्रवाई ने भारतीयों को इस बीमारी के प्रति सजग होने की गंभीरता परिलक्षित की।

देश के कई हिस्सों में तालाबंदी, लोगों के अपने घरों से बाहर न निकलने, आपस में दूरी बना कर रखने, लगातार हाथों की सफाई, हाथों को मुंह, नाक में न लगाने और स्वच्छता रखने के पुरजोर सुझावों ने यह स्थापित कर दिया है कि ऐसा करने के पीछे स्पष्ट कारण है। विभिन्न प्रकार की संस्कृतियों, धर्मों, भाषाओं और जीवन की विविधताओं से भरे भारत देश ने एक सामान्य रूप से कोविड-19 से निबटने के लिए विभिन्न तार्किक और वैज्ञानिक सुझावों को सहर्ष स्वीकार किया है। इगित परिस्थितियों से यह संदेश भी निकाला जाना चाहिए कि अंततः जब जान पर आती है तो संपूर्णता से वैज्ञानिकता और तार्किकता क कसौटी पर खरे उतरने वाले उपायों की ही स्वीकार्यता होती है। आज की परिस्थिति में जब प्रत्येक मानव को एक वायरस ने झकझोर कर रख दिया है तब सभी को विज्ञान और तर्क का एहसास हो रहा है। साथ ही वैश्विक स्तर पर कोविड-19 से प्रभावितों को बचाने के सामूहिक प्रयासों के साथ इससे बचाव के सर्वमान्य सुझाव दिए जा रहे हैं। इसमें कहीं भी व्यापक रूप से प्रचारित आस्था व मूल्य किसी भी प्रकार से आड़े नहीं आ रहे। ऐसा इसलिए है क्योंकि प्रत्येक मानव के लिए उसका जीवन मूल्य है और कोई भी अतार्किक प्रावधानों के चलते इसे नहीं खोना चाहेगा।

गौर किया जाना चाहिए कि पूर्व में भी विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा समय-समय पर घोषित महामारियों जैसे कालरा, चिकनगुनिया, चेचक, इबोला वायरस, हेंड्रा वायरस, लासा बुखार, सार्स, जीका वायरस आदि के प्रकोप पर भी दुनिया ने चिकित्सकीय समाधानों से ही विजय प्राप्त की है। विश्वास है कि निश्चित ही संपूर्ण मानवता के संयमित, सजग और सतर्क होने से कोविड-19 पर भी शीग्र ही नियंत्रण हो सकेगा। विगत की महामारियों से हुई जनहानि के पीछे के कारणों में तात्कालिक सामाजिक रूढिवादि प्रथाओं, पाखंड और आस्था आदि प्रमुखता से प्रकाश में आते रहे हैं। यह स्वीकार करना होगा कि किसी भी नई बीमारी के सम्यक इलाज के तरीके खोजने में वांछित समय लगेगा और यह विज्ञान की ही ताकत है कि आज मानव समय-समय पर होने वाली नाना प्रकार की महामारियों के मूल तक पहुंच कर उनके इलाज के तरीके खोजने में सफल रहा है।

समाज को इस बात पर भी चिंतन करना चाहिए कि कहीं हम प्रगित की अपेक्षा रखते-रखते अपने पर्यावरण और वातावरण में व्याप्त जीवन संतुलन तो नहीं बिगाड़ रहे। जिसके चलते कभी मानवता को मौसम के बदलते मिजाज और उसक अन्य रूपों में मार का सामना करना पड़ रहा है। उदाहरण स्वरूप हमने विकास करने केलिए वन क्षेत्र को समाप्त करके जंगल के पशु पक्षियों को उनके नासर्गिक जीवन से दूर करने का काम किया है और उसके दुष्परिणाम दिखने लगे हैं। विकास की इस दौड़ में यह अत्यधिक आवश्यक हो गया है कि संपूर्ण विश्व आर्थिक संपन्नता और जीवन को सहज बनाने के प्रयासों के साथ संधारणीय विकास के लिए संयुक्त राष्ट्र संघ द्वारा दिए गए संधारणीय विकास के लक्ष्यों पर अति गंभीरता के साथ कार्रवाई कर मानवता का संधारणीय विकास सुनिश्चित करे। वसुधैव कुटुंबकम के मूल मंत्र को सफल बनाने में देशों की आपसी झरझर सीमाओं से किसी भी प्रकार की नकारात्मक शक्तियों को रोकना पारस्परिक हितों में है और कोई भी कदम उठाने से पहले यह ध्यान रखना चाहिए कि इसका प्रभाव संपूर्ण मानव जाति पर पड़ेगा।

वर्तमान स्थिति की गंभीरता के विश्लेषण से ऐसा प्रतीत होता है कि शायद ही कभी किसी ने वैश्विक स्तर पर फैलने वाली इस प्रकार की किसी महामारी से होने वाली जन हानि की कल्पना की होगी। इस समय कोविड-19 की पृष्ठभूमि में एक बार पुनः सभी प्रबुद्धजनों को अतार्किक तथ्यों, जादुयी चमत्कारों तथा आस्था आधारित पाखंडों को मानने वाले समाज के हिस्से को वैज्ञानिक चिंतन की दिशा में ले जाने का एक सुअवसर प्राप्त हुआ है। अपने जीवन की अभिलाषाओं की पूर्ति के लए कटिबद्ध युवा पीढी के लिए यह एक ऐसी अभूतपूर्व घटना है जब सर्व समाज जीवन के लिए चिंतित दिख रहा है और कोई पुख्ता इलाज उपलब्ध न होने से भयभीत भी है। अतः युवाओं को अपने से बड़े और छोटे दोनों उम्र के लोगों को वैज्ञानिक स्वभाव व तर्क संगत बातों को मानने के लिए प्रेरित करने और प्रत्येक स्तर पर मानव जीवन की गुणवत्ता बढाने का संकल्प लेकर समाज को 21वीं सदी की समग्रता में विकसित समाज बनाने का प्रयास करना चाहिए। मानवता के संरक्षण और संवर्धन के लिए वैज्ञानिकता को हम सभी की जीवन शैली में तर्क की शक्ति के साथ समावेशित किया जाना अपरिहार्य हो गया है अन्यथा की दशा में मानवजनित कार्य ही पर्यावरणीय असंतुलन, महामारियों तथा प्राकृतिक आपदाओं से मनुष्यों के जीवन लीलते रहेंगे।

आइये हम सभी अपने जीवन शैली में तर्क व वैज्ञानिकता की समझ को समाहित कर मानव जाति, पशु, पक्षी और पर्यावरण के किसी आयाम पर कुठाराघात किए बिना स्वच्छ, सात्विक और स्वस्थ जीवन यापन करने का प्रयास करें।

प्रो ओंकार सिंह, पूर्व कुलपति, मदन मोहन मालवीय प्रौद्योगिकी विश्वविद्यालय, गोरखपुर

             

         

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