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काशी का मान: यतीन्द्रनाथ चतुर्वेदी और डॉ. विजयनाथ मिश्र को 'राजभाषा गौरव सम्मान', मुंबई रवाना

अमित शाह 14 सितंबर को 'दंडपाणि च भैरवं' कृति के लिए देंगे पुरस्कार; 6वें अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन में होंगे सम्मानित

 

वाराणसी / मुंबई (भदैनी मिरर ब्यूरो):
संस्कृति और साहित्य की वैश्विक नगरी काशी के लिए 13 सितंबर 2026 का दिन एक और गौरवपूर्ण उपलब्धि लेकर आया। काशी के समर्पित साहित्यकार यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी और देश के प्रख्यात न्यूरोलॉजिस्ट प्रो. (डॉ.) विजय नाथ मिश्र अपनी चर्चित कृति 'दंडपाणि च भैरवं' के लिए 'राजभाषा गौरव पुरस्कार' प्राप्त करने मुंबई के लिए रवाना हो गए हैं।
हिंदी में उत्कृष्ट मौलिक लेखन के लिए चयनित इन दोनों विभूतियों को 14 और 15 सितंबर 2026 को नवी मुंबई (वाशी) स्थित सिडको एग्जीबिशन सेंटर में आयोजित छठे अखिल भारतीय राजभाषा सम्मेलन के दौरान यह सम्मान प्रदान किया जाएगा। कार्यक्रम के मुख्य अतिथि व अध्यक्ष भारत सरकार के गृह एवं सहकारिता मंत्री अमित शाह होंगे।

दो दिवसीय ऐतिहासिक सम्मेलन में जुटेंगे देशभर के हिंदी विशेषज्ञ


गृह मंत्रालय के राजभाषा विभाग द्वारा आयोजित इस भव्य राष्ट्रीय सम्मेलन में भारत सरकार और महाराष्ट्र राज्य सरकार के कई वरिष्ठ मंत्री, संसदीय राजभाषा समिति के सदस्य, विभिन्न मंत्रालयों की हिंदी सलाहकार समितियों के प्रतिनिधि उपस्थित रहेंगे।

इसके अलावा देश भर के सरकारी विभागों, सार्वजनिक उपक्रमों (PSUs), राष्ट्रीयकृत बैंकों, प्रमुख विश्वविद्यालयों और नगर राजभाषा कार्यान्वयन समितियों (नराकास) से जुड़े शीर्ष अधिकारी व हिंदी विशेषज्ञ प्रतिनिधि के रूप में भाग लेंगे।


"काशी ने कालजयी सफर तय किया है"- यतीन्द्र नाथ चतुर्वेदी

पुरस्कार की घोषणा और मुंबई रवानगी के अवसर पर साहित्यकार यतीन्द्रनाथ चतुर्वेदी ने अपनी भावनाएं साझा करते हुए कहा- "यह पुस्तक भारत की सनातन संस्कृति, परंपरा और आध्यात्मिक मूल्यों को उजागर करती है। जहाँ सृष्टि के आदिकाल से मौन तपस्यारत है और स्वयं भगवान शिव के लिए शब्द नाद के रूप में जन्म लेते हैं, वहीं स्वयंभू शिव हर युग में देह और प्राण को सायुज्य प्रदान करते हैं। काशी ने प्राचीन काल से लेकर आज तक एक कालजयी सफर तय किया है।"


यह है योगदान 

यतीन्द्रनाथ चतुर्वेदी का साहित्य भारत की ऋषि-परंपरा, वैदिक इतिहास और आधुनिक समाजशास्त्र का एक जीवंत दस्तावेज़ है। वर्तमान में यह पेट्रोलियम एवं प्राकृतिक गैस मंत्रालय (भारत सरकार) की हिंदी सलाहकार समिति के सदस्य हैं। इससे पूर्व आप खेल, संस्कृति, नवीन एवं नवीकरणीय ऊर्जा, वित्त (राजस्व) तथा नागर विमानन जैसे मंत्रालयों की हिंदी सलाहकार समितियों में राजपत्रित सदस्य रह चुके हैं। आपने AICTE की तकनीकी पाठ्यपुस्तक पुरस्कार योजना और डॉ. भीमराव आंबेडकर मुक्त विश्वविद्यालय (अहमदाबाद) के लिए उच्च स्तरीय पठन सामग्री का संपादन व लेखन किया है। शोध क्षेत्र में उत्कृष्ट कार्य हेतु आपको संस्कृति मंत्रालय द्वारा वरिष्ठ अध्येतावृत्ति (Senior Fellowship) एवार्ड भी मिल चुका है।


"बिखरे अक्षरों को चुनकर समेटा है आनंदकानन का इतिहास"- प्रो. (डॉ.) विजय नाथ मिश्र


बीएचयू के प्रसिद्ध चिकित्सक और साहित्यकार प्रोफेसर विजय नाथ मिश्र ने कहा- "'दंडपाणि च भैरवम्' हमारे आराध्य देवों और भारतीय सभ्यता की परत-दर-परत संक्षिप्त कथा है। आनंदकानन (काशी) की इस महान इतिहासगाथा के सूत्र जगह-जगह टूटे और बिखरे हुए अक्षरों में मौजूद थे, जिन्हें हमने निष्ठापूर्वक एकत्र कर इस पुस्तक का रूप दिया है।"

चिकित्सा और काशिका परंपरा के संवाहक

प्रो. विजयनाथ मिश्र बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) के चिकित्सा विज्ञान संस्थान में न्यूरोलॉजी विभाग के पूर्व अध्यक्ष और सर सुंदरलाल चिकित्सालय के पूर्व चिकित्सा अधीक्षक रहे हैं। प्रोफेसर मिश्रा पिछले 30 वर्षों से मिर्गी रोगियों के इलाज और जागरूकता में समर्पित रहने के कारण उन्हें संपूर्ण उत्तर भारत की हिंदी पट्टी में 'मिर्गी मैन' के नाम से जाना जाता है। इससे पूर्व उनकी रचना "रामचरित मानस की पांडुलिपियाँ (ज्ञात-अज्ञात तथ्य)" को हिन्दुस्तानी एकेडमी, इलाहाबाद द्वारा प्रतिष्ठित 'तुलसीदास पुरस्कार' से सम्मानित किया जा चुका है। प्रोफेसर मिश्र संकटमोचन मंदिर के पूर्व महंत, महान वैज्ञानिक व पर्यावरणविद स्व. प्रोफेसर वीरभद्र मिश्र के सुपुत्र हैं और 'स्वच्छ गंगा अनुसंधान प्रयोगशाला' के माध्यम से गंगा में प्रदूषण नियंत्रण पर लगातार शोध कर रहे हैं। काशी के घाटों, भिक्षुकों और निराश्रितों के प्रति उनकी संवेदनशीलता के कारण स्थानीय लोग उन्हें 'ओपन ओपीडी चलाने वाले चिकित्सक' के रूप में जानते हैं।
काशी की इन दो महान विभूतियों को राष्ट्रीय स्तर पर मिलने जा रहे इस सम्मान से पूरे पूर्वांचल और हिंदी साहित्य जगत में हर्ष की लहर है।