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रौद्र संवत्सर 2083 पर अद्भुत स्वागत: शंकराचार्य दे दिया संदेश- ‘गो-मतदाता’ बनें, गोरक्षा धर्मयुद्ध का शंखनाद

साढ़े तीन वर्षों का सेवा लेखाजोखा प्रस्तुत, 81 दिवसीय गविष्ठि यात्रा की घोषणा, राजनीति को धर्मानुशासित करने का आह्वान

 
वाराणसी। शंकराचार्य स्वामी अविमुक्तेश्वरानंद सरस्वती ने नव संवत्सर ‘रौद्र’ (विक्रमी 2083) के अवसर पर विश्वभर के सनातन धर्मावलंबियों के नाम अपना वार्षिक संदेश जारी किया। इस संदेश में उन्होंने अपने ज्योतिष्पीठारोहण के साढ़े तीन वर्षों की उपलब्धियों का लेखाजोखा प्रस्तुत करते हुए देश की राजनीति, धर्म और वैश्विक हालात पर विस्तृत विचार रखे।
काल-गणना के साथ सेवा का विवरण
शंकराचार्य ने बताया कि 12 सितंबर 2022 को पीठ का दायित्व संभालने से लेकर 19 मार्च 2026 तक कुल 1284 दिन धर्म, संस्कृति और लोककल्याण के कार्यों को समर्पित रहे। उन्होंने इसे “धर्म मर्यादा की निरंतर साधना” बताया।
प्रमुख सेवा-प्रकल्पों की झलक
अपने कार्यकाल की उपलब्धियों को रेखांकित करते हुए उन्होंने कई महत्वपूर्ण परियोजनाओं का उल्लेख किया—
* काशी के निकट 1008 एकड़ में ‘जगद्गुरुकुलम्’ का निर्माण, जहां वैदिक ज्ञान और आधुनिक विज्ञान का समन्वय होगा।
* छत्तीसगढ़ के बेमेतरा में ‘सवा लाख शिवलिंग मंदिर’ का निर्माण अंतिम चरण में।
* 50 से अधिक विरक्त शिष्यों का निर्माण, जो सनातन परंपरा को आगे बढ़ा रहे हैं।
* पूरे भारत में 2 लाख किलोमीटर से अधिक की धर्म-जागृति यात्रा।
* ‘गौ-प्रतिष्ठा अभियान’ के तहत महायज्ञ, ध्वज यात्रा और वृंदावन से दिल्ली तक पदयात्रा।
‘गो-मतदाता’ बनने का आह्वान
शंकराचार्य ने राजनीति को धर्म के अनुशासन में लाने पर जोर देते हुए कहा कि अब हिंदू समाज केवल “वोट बैंक” नहीं रहेगा। उन्होंने प्रत्येक नागरिक से ‘गो-मतदाता’ बनने की अपील करते हुए कहा कि वही राजनीतिक समर्थन का पात्र होगा, जो गौ-माता को राष्ट्रमाता का दर्जा दिलाने और गोवंश हत्या पर पूर्ण प्रतिबंध का संकल्प ले।
वैश्विक तनाव पर स्पष्ट रुख
अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव का उल्लेख करते हुए उन्होंने ‘वसुधैव कुटुम्बकम्’ की भावना को दोहराया। उन्होंने कहा कि किसी भी संप्रभु राष्ट्र पर आक्रमण करना अधर्म है और साम्राज्यवादी विस्तारवाद मानवता के लिए घातक है।
 ‘गविष्ठि वर्ष’ और धर्मयुद्ध की घोषणा
नव संवत्सर ‘रौद्र’ को ‘गविष्ठि वर्ष’ घोषित करते हुए शंकराचार्य ने उत्तर प्रदेश में 81 दिवसीय गविष्ठि यात्रा और ‘गोरक्षा धर्मयुद्ध’ की घोषणा की। इसके लिए ‘शंच (शंकराचार्य चतुरंगिणी)’ सेना का गठन पंचमी तिथि से प्रारंभ किया जाएगा।
उन्होंने बताया कि ‘शं’ का अर्थ कल्याण और ‘च’ का अर्थ समुच्चय है, और यह सेना गौ-वंश संरक्षण के लिए समर्पित होगी।
अंत में शंकराचार्य ने सभी सनातन धर्मावलंबियों को नव संवत्सर ‘रौद्र’ की मंगलकामनाएं देते हुए धर्म, संस्कृति और राष्ट्रहित में एकजुट रहने का आह्वान किया।