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वाराणसी : DM से मिला काशी का डोमराजा परिवार, कहा-बंद कराइए मणिकर्णिका घाट की ‘इवेंट मैनेजमेंट‘ वाली मसाने की होली

काशी में कभी नही रही ऐसी परम्परा, बाबा विश्वनाथ के साथ रंगभरी एकादशी को काशीवासी खेलते हैं अबीर-गुलाल की होली

 

अपनों को खोने के बाद शोक में डूबे परिजनों के बीच मस्ती करना भद्दा मजाक

लोगों की भावनाओं के साथ खेलवाड़ है, यह धार्मिक मान्यता और श्मशान की मर्यादा के खिलाफ

वाराणसी, भदैनी मिरर। काशी के मणिकर्णिका घाट पर परम्परा के नाम पर खेली जानेवाली मसाने की होली पर इस बार फिर ग्रहण लग गया है। इस बार काशी का डोमराजा परिवार मजबूती से इसके खिलाफ खड़ा हो गया है। डोमराजा परिवार के विश्वनाथ चौधरी ने अपने सहयोगियों के साथ मंगलवार को जिला मुख्यालय पहुंचकर जिलाधिकारी को ज्ञापन सौंपा और इसे बंद कराने की मांग की है। 

विश्वनाथ चौधरी ने बताया कि काशी में मसाने की होली कभी नही होती थी और न ही यह पुरानी परम्परा है। कुछ लोग इसे निहित स्वार्थ के लिए इवेंट बनाकर शवदाह वाली जगह को तमाशा बना रहे हैं। निहित स्वार्थों की पूर्ति कर रहे हैं। डोमराजा परिवार ने कहाकि मसाने की होली के दौरान महिलाएं और युवतियां जाती है। लोग शराब पीयर छक कर पीते हैं। घाट पर शवों के साथ उनके दुखी परिजन आते हैं। वहां लोग मस्ती में नाचते और शवों के साथ सेल्फी लेते हैं। हुड़दंग और अभ्रदता की हद हो जाती है। इन तमाशेबाजी के कारण शवदाह बाधित हो जाता है। कहाकि सोचिए कि एक और परिवार के व्यक्ति का शव लेकर आये दुखी लोगों पर इनकी कथित मस्ती का क्या असर पड़ता होगा। इसके साथ ही शास्त्रों में महिलाओं का श्मशान आना वर्जित है। इसके बावजूद युवतियां बुलाई जाती हैं और श्मशान को तमाशा बनाया जाता है।

आपको बता दें कि डोमराजा परिवार के अलावा काशी विद्वत परिषद सहित कई संस्थाएं इस परंपरा का विरोध कर रही हैं और इसे अशास्त्रीय बताया है। आपको बता दें कि मसाने की होली की शुरुआत 2009 में हुई थी। इससे पहले काशी में कभी नही होती थी। डोमराजा परिवार का कहना है कि काशी में रंगभरी एकादशी के दिन जब श्रीकाशी विश्वनाथ माता पार्वती की विदाई कराकर ले आते हैं तभी अबीर-गुलाल के साथ काशीवासी होली खेलते हैं। यही काशी की परम्परा रही है। यदि किसी को होली खेलनी है तो रंगभरी एकादशी को बाबा दरबार जांय। मसान में होली नही होगी। यह अपने स्वजनों को खोने के बाद घाट पर दाह संस्कार के लिए आये लोगों की भावनाओं के साथ खेलवाड़ तो है ही उनके साथ भद्दा मजाक है। यह धार्मिक मान्यता और श्मशान की मर्यादा के खिलाफ है। हालांकि आयोजक इसे पुरानी परंपरा मानकर बचाव कर रहे हैं। जबकि काशीवासी अच्छी तरह जानते हैं कि पहले ऐसी कोई परम्परा नही रही और मसान पर चिता-भष्म की होली नही खेली जाती रही।

डोमराजा परिवार का कहना है कि चिता भस्म की होली औघड़ और डोमराजा परिवार खेल सकता है। उनका यह अधिकार है। हमारा परिवार सदियों से दाह संस्कार करता आ रहा है, कभी चिता भस्म की होली नही खेली गई। एक ओर घाट पर दाह संस्कार के लिए आये लोग अपनों के खोने के गम में डूबे होते हैं वैसी जगह उत्सव मनाना अनुचित है। विद्वत परिषद का आरोप है कि इस परंपरा के नाम पर श्मशान में नशे में हुड़दंग मचाया जा रहा है, जो श्मशान की पवित्रता को धूमिल कर रहा है। सनातन रक्षक दल के अनुसार, यह परंपरा पहले केवल औघड़ बाबाओं के लिए थी, लेकिन अब इसे 2014 के बाद से इवेंट मैनेजमेंट की तरह पेश किया जा रहा है। डोमराजा परिवार और शास्त्रीय मर्यादाओं के जानकारों का तर्क है कि श्मशान मोक्ष की भूमि है, उत्सव मनाने की जगह नहीं। जहां परिवार अपनों को खोने के शोक में होते हैं, वहां नाच-गाना और हुड़दंग करना संवेदनहीनता है। श्मशान में होली खेलने की यह परंपरा शास्त्र सम्मत नहीं है। इसे “इवेंट मैनेजमेंट“ की तरह बढ़ावा दिया गया है।

डीएम को दिये ज्ञापन में क्या कहा विश्वनाथ चौधरी ने

आपसे निवेदन है कि मैं विश्वनाथ चौधरी डोमराजा मणिकर्णिका घाट वाराणसी, विगत कुछ वर्षों से होने वाले स्वघोषित आयोजन चिता भस्म की होली से बहुत ज्यादा आहत हूं। क्योंकि अब इस आयोजन का विस्तारीकरण मसाननाथ मंदिर के बाहर भी हो चुका है। अब इस कार्यक्रम में बहुत ज्यादा उपद्रव और उत्पात होने लगा है जिसके कारण मृत्य शरीरों की अत्येष्टि में बहुत अधिक बाधा हो रही है। इस प्रकार का कृत्य अनैतिक और अधार्मिक है। अतः आपसे निवेदन है कि इस प्रकार के उपद्रवी आयोजनों की अनुमति चिता जलाने वाले स्थान पर आयोजित करने की अनुमति न प्रदान करें, यह कृत्य पूर्ण रूप से धर्म विरोधी है।
इस स्वघोषित आयोजन में शराब के नशे में मृत शव के साथ अभद्रता शव यात्रियों के साथ अभद्रता, महिलाओं व नाबालिग बच्चियों का श्मशान पर नशे की हालत में मृत शरीर के साथ चिता के साथ रील बनाना इत्यादि जैसे प्रपंच भी खूब होते है। यहां की जानता इन सब कृत्य से आहत है, जिस परिवार का शव होता है उसकी पीड़ा वही महसूस कर सकता हैं। यहां की शांति और गरिमा भंग करने वालों के खिलाफ सख्त से सख्त कार्रवाई करें और काशी की इस पावन धरती को इस अधार्मिक एक दिवसीय ग्रहण से मुक्त करवाएं। कृपया उक्त विषय को गंभीरता से लेते हुए शीघ्र इसका निवारण करने का कष्ट करें।