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Varanasi News: प्राइवेट अस्पताल से बिगड़ा केस, चोलापुर CHC के डॉक्टरों ने 26 दिन के मासूम को खून चढ़ाकर बचाया

Newborn Life Saved: गंभीर पीलिया और एनीमिया से जंग जीत कर घर लौटा मोनू कहार का लाल, जांच में हुआ दुर्लभ 'बीटा थैलेसीमिया' का खुलासा, डॉक्टरों की टीम ने पेश की मिसाल।

 

वाराणसी (भदैनी मिरर): उत्तर प्रदेश के सरकारी अस्पतालों और डॉक्टरों की कार्यशैली को लेकर अक्सर सवाल उठते रहते हैं, लेकिन वाराणसी के चोलापुर सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्र (CHC) से डॉक्टरों की भगवान रूपी छवि को बयां करने वाली एक बेहतरीन खबर सामने आई है। यहाँ के बाल रोग विभाग की टीम ने तत्परता दिखाते हुए गंभीर पीलिया और जानलेवा एनीमिया (खून की भारी कमी) से जूझ रहे महज 26 दिन के एक नवजात शिशु को मौत के मुंह से बाहर निकाल लिया है।

निजी अस्पताल की लापरवाही के बाद CHC पहुंचा था परिवार

प्राप्त जानकारी के अनुसार, क्षेत्र के रहने वाले मोनू कहार और निर्मला के 26 दिन के बेटे का जन्म एक निजी अस्पताल में हुआ था। वहां से छुट्टी मिलने के बाद बच्चे की तबीयत गंभीर रूप से खराब होने लगी। घबराए परिजन 14 मई 2026 को उसे चोलापुर सीएचसी लेकर पहुंचे।

अस्पताल में तैनात बाल रोग विशेषज्ञ (Pediatrician) डॉ. आकांक्षा सिंह की ओपीडी में जब बच्चे का परीक्षण हुआ, तो स्थिति बेहद डरावनी थी। नवजात के हाथ की हथेलियां और पैर के तलवे तक पूरी तरह पीले पड़ चुके थे।

जांच में हीमोग्लोबिन स्तर देख चौंक गए डॉक्टर

सीएचसी के अधीक्षक डॉ. आरबी यादव ने मामले की विस्तृत जानकारी देते हुए बताया कि शुरुआती लैब टेस्ट में बच्चे का हीमोग्लोबिन गिरकर सिर्फ 5.1 ग्राम/डेसिलीटर रह गया था, जो नवजात के लिहाज से बेहद खतरनाक है। इसके अलावा सीरम बिलीरुबिन का स्तर 14 मिलीग्राम/डेसिलीटर तक पहुंच गया था।

गंभीर हाइपरबिलीरुबिनेमिया और एनीमिया की छिपी वजह जानने के लिए डॉक्टरों ने एडवांस HPLC (हाई परफॉर्मेंस लिक्विड क्रोमैटोग्राफी) जांच कराई। इस टेस्ट की रिपोर्ट में बच्चे के शरीर में हेमोलिटिक एनीमिया के साथ β-थैलेसीमिया (Beta-Thalassemia) होने के पुख्ता लक्षण मिले।

24 घंटे की सघन मैराथन चिकित्सा और ब्लड ट्रांसफ्यूजन

चोलापुर सीएचसी की टीम ने बिना एक पल गंवाए नवजात का इलाज युद्ध स्तर पर शुरू किया:

  • बच्चे को तुरंत एडवांस फोटोथेरेपी यूनिट (Intensive Phototherapy) पर शिफ्ट किया गया।

  • डॉक्टरों की निगरानी में 24 घंटे के भीतर दो बार पैक्ड रेड ब्लड सेल (PRBC) ट्रांसफ्यूजन किया गया (यानी नया खून चढ़ाया गया)।

इस विशेषज्ञ और संवेदनशील उपचार का असर यह हुआ कि बुधवार को छुट्टी के वक्त मासूम का हीमोग्लोबिन बढ़कर 11.4 ग्राम/डेसिलीटर हो गया और पीलिया पूरी तरह नियंत्रण में आ गया।

मुख्य चिकित्सा अधिकारी (CMO) डॉ. राजेश प्रसाद का बयान: "ग्रामीण क्षेत्रों में स्थित हमारे सामुदायिक स्वास्थ्य केंद्रों पर अब बड़े शहरों जैसी विशेषज्ञ चिकित्सा सेवाएं उपलब्ध कराई जा रही हैं। चोलापुर सीएचसी की टीम ने नवजात के इलाज में जो संवेदनशीलता, तत्परता और दक्षता दिखाई है, वह पूरे स्वास्थ्य विभाग के लिए गर्व की बात है। यह टीमवर्क की एक बड़ी जीत है।"

अस्पताल से पूरी तरह स्वस्थ होकर मुस्कुराते बच्चे को गोद में लेकर जब माता-पिता घर लौटे, तो उनकी आंखों में आंसू थे। उन्होंने चोलापुर सीएचसी के डॉक्टरों को कोटि-कोटि धन्यवाद दिया है। इस सफल इलाज के बाद से आसपास के ग्रामीण इलाकों में सरकारी अस्पताल के डॉक्टरों की खूब तारीफ हो रही है।