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वाराणसी: "कजरी गाने में न छाते की जरूरत, न रेनकोट की", पद्मश्री मालिनी अवस्थी बोलीं— भीगकर गाना ही कजरी की आत्मा है

गंगा तट पर सावन की फुहारों के बीच आयोजित कजरी कार्यशाला में गूंजे लोकगीत; मालिनी अवस्थी ने पूर्वांचल की समृद्ध कजरी परंपरा और अखाड़ों के महत्व को किया रेखांकित।

 

वाराणसी (भदैनी मिरर)। पावन गंगा की गोद और सावन की रिमझिम फुहारों के बीच वाराणसी में आयोजित कजरी कार्यशाला में लोकसंगीत और संस्कृति का अनोखा संगम देखने को मिला। प्रसिद्ध लोकगायिका पद्मश्री मालिनी अवस्थी ने कार्यशाला के दौरान कजरी के सौंदर्य और इसकी गहरी जड़ों पर विस्तार से चर्चा की।

मालिनी अवस्थी ने मुस्कुराते हुए कहा, "कजरी गायन में न तो छाते की जरूरत होती है और न ही रेनकोट की। बारिश में भीगकर गाने का जो आनंद है, वही इस लोकसंगीत की वास्तविक आत्मा है।" उन्होंने कहा कि वर्षा केवल एक मौसम भर नहीं है, बल्कि जेठ की तपती धरती को मिला भगवान इंद्रदेव का अनमोल आशीर्वाद है। इसी प्राकृतिक आनंद और उत्सव को कजरी के माध्यम से अभिव्यक्त किया जाता है।

पूर्वांचल में हैं कजरी की सबसे मजबूत जड़ें

कजरी की समृद्ध परंपरा का उल्लेख करते हुए उन्होंने बताया कि कजरी आज विश्वभर में प्रसिद्ध है, लेकिन इसकी सबसे मजबूत और गहरी जड़ें पूर्वांचल की माटी में रची-बसी हैं।

  • अखाड़ों की परंपरा: काशी, मिर्जापुर, चुनार और चंदौली में आज भी कजरी के पारंपरिक अखाड़े जीवित हैं, जहां गुरु-शिष्य परंपरा के तहत इस विधा को सहेजा और आगे बढ़ाया जा रहा है।

  • साहित्यकारों और संवाहकों का योगदान: भारतेंदु हरिश्चंद्र, प्रेमधन व्यास और अंबिकादत्त व्यास जैसे मूर्धन्य साहित्यकारों ने कजरी को समृद्ध किया।

  • महान विभूतियां: पद्मश्री हीरालाल यादव, गुल्लू यादव, पंडित राम कैलाश यादव, उर्मिला श्रीवास्तव, सिद्धेश्वरी देवी और विदुषी गिरिजा देवी जैसी महान हस्तियों ने कजरी को अंतरराष्ट्रीय मंचों पर नई ऊंचाइयां दीं।

राग देश और सारंग की धुनों पर बरसती है कजरी

मालिनी अवस्थी ने बताया कि बनारस घराने का शायद ही कोई ऐसा शास्त्रीय गायक या साधक हो, जिसने कजरी न गाई हो। कजरी की अधिकांश धुनें वर्षा ऋतु के प्रमुख रागों—राग देश, सारंग, सोरठ और मेघ पर आधारित होती हैं। यही कारण है कि इन धुनों को सुनते ही मानो गगन में काले बादल उमड़ आते हैं और चारों ओर बरसात का सोंधा वातावरण जीवंत हो उठता है।

मालिनी अवस्थी को आज भी याद है अपनी पहली कजरी

अपने शुरुआती दिनों को याद करते हुए उन्होंने साझा किया कि उनके जीवन की पहली कजरी थी—

"बरसे सावनवा के बैरी बदरवा, कजरवा धुल-धुल जाए मोर राम..."

इसके बाद उन्होंने अवधी शैली की प्रसिद्ध कजरी "अरे रामा, कृष्ण बने मनिहारन..." सीखी और मंचों पर प्रस्तुत की।

लोक परंपरा और संस्कृति के संरक्षण का अनूठा प्रयास

गंगा किनारे आयोजित यह कजरी कार्यशाला केवल संगीत सिखाने का उपक्रम नहीं, बल्कि भारतीय लोकसंस्कृति, प्रकृति, आध्यात्मिकता और गुरु-शिष्य परंपरा को जीवंत रखने का एक सराहनीय प्रयास सिद्ध हो रही है। इस कार्यशाला में भाग ले रहे युवा साधक न केवल बेहतर गायक बनकर उभर रहे हैं, बल्कि अपनी सांस्कृतिक विरासत की गहरी समझ भी साथ लेकर लौट रहे हैं।