वाराणसीः तमाम विरोध के बावजूद हरिश्चंद्र घाट पर खेली गई मसाने की होली
भूत-पिशच और अधोरी बनकर तमाम बहुरूपिये हुए शामिल
वीडियो पर लाइक, सक्स्क्राइब कराकर कमानेवाले यू-ट्यूबरों की भी रही भरमार
काशी में कभी नही रही ऐसी परम्परा, लेकिन काशी के इतिहास से अनिभिज्ञ प्रशासन रहा मौन
वाराणसी, भदैनी मिरर। काशी की पुरानतन परम्परा न होने और तमाम विरोध के बावजूद शुक्रवार को हरिश्चंद्र घाट पर मसाने की होली मनाई गई। बाबा मसाननाथ के अभिषेक और आरती के बाद भस्म की होली शुरू हुई। रील बनानेवालों और सोशल मीडिया पर अपना प्रोफाइल डालनेवालों की भरमार रही। लोग डीजे पर भजन और गानों पर नाच रहे थे। जो लोग आम दिनों में हरिश्चन्द्र घाट के आसपास दिखाई तक नही देते वह रील बनाने या मीडिया में फोटो प्रकाशित होने के चक्कर में बनठन कर आये थे। रामलीलाओं में लाग-विमान के हिस्सा बननेवाले भी आज अघोरी की वेश भूषा में पहुंचे थे। घाट पर चिता की राख और अबीर-गुलाल के साथ होली खेली गई। हालांकि कतिपय लोगों ने ही चिता की राख को हाथ लगाया बाकी अपनी लीला में ही मगन रहे। कुछ हो न हो लेकिन उन्हें भरोसा था कि वह या तो रील बन रहे हैं या खुद की रील बनाकर अपनी सोशल मीडिया पर पोस्ट कर महाअघोरी का तमगा ले लेंगे।
कुछ ऐसी ही शुरू हुई इस नई परम्परा के साथ शुक्रवार को गाजे-बाजे के साथ कुछ लोग शरीर पर चिता भस्म लपेटे और गले में नरमुंडों की माला पहन कर पहुंचे हैं। मसाने की होली देखने के लिए हजारों लोग भी पहुंचे। विदेशी पर्यटक भी घाट पर नजर आये। सुरक्षा के लिहाज से पुलिस बल तैनात रही। हरिश्चंद घाट पर दोपहर 12 बजे से ही लोगों का जमावड़ा शुरू हो गया। लोग नरमुंड की माला और गले में सर्प लटकाकर इस होली में शामिल हुए। दोपहर एक बजे से घाट पर मसाने की होली शुरू हुई। चिता भस्म की होली कवर करने के लिए बड़ी संख्या में यूट्यूबर पहुंचे थे। यूट्यूबर ड्रोन कैमरे से मलाने की होली के विजुअल बना रहे थे। अब मणिकर्णिका घाट पर शनिवार को चिता भस्म की होली पर खेली जाएगी।
कहा जाता है कि मसाने की होली प्राचीन है और इनका उल्लेख परंपरागत प्रपत्रों एवं स्थानीय इतिहासकारों के अभिलेखों से प्राप्त होता है। अघोर परंपरा के लोग शिव के उपासक हैं। उनके लिए मसाने की होली खास होती है। लेकिन काशीवासी इसे निहित स्वार्थ के लिए अपने निहित लाभ के लिए शुरू की गई नई परम्परा बता रहे हैं। कापोल कल्पित कहानी के अनुसार पारंपरिक साक्ष्यों में मसाने की होली संगठित एवं उत्सवी स्वरूप में करीब 350 साल पहले बाबा कालभैरव के तत्कालीन पीठाधिपति अघोरी उमानाथ, बाबा कीनाराम महाराज के प्रधान शिष्य बाबा बीजाराम और नाथ परंपरा के प्रसिद्ध संत योगी दीनानाथ के संयोजन में मसाने की होली शुरू हुई थी। लेकिन इसका कोई ठोस प्रमाण नही है। कहनेवाले तो इसे परम्परा के नाम पर तमाशा और कमाई का जरिए बता रहे हैं।