वाराणसी: शहर से बाहर मीट-मांस की दुकानें भेजने के फैसले पर भारी बवाल, कांग्रेस और व्यापारियों ने किया नगर निगम का घेराव
"रोजगार पर लात मारना बंद करे सरकार" - नगर निगम परिसर में धरने पर बैठे सैकड़ों प्रदर्शनकारी, सिगरा पुलिस अलर्ट
वाराणसी : धर्म और संस्कृति की नगरी काशी में इस समय एक प्रशासनिक फैसले को लेकर सियासी और सामाजिक पारा बेहद गर्म हो गया है। वाराणसी नगर निगम द्वारा शहर की सीमा के भीतर से मांस, मछली और मुर्गे की दुकानों को पूरी तरह से बाहर (शिवपुर, रामनगर, अवलेशपुर आदि क्षेत्रों में) विस्थापित करने के प्रस्ताव के खिलाफ चौतरफा विरोध शुरू हो गया है।
इस फैसले के विरोध में आज कांग्रेस, समाजवादी पार्टी (सपा), आम आदमी पार्टी (आप), स्त्री मुक्ति लीग और दिशा छात्र संगठन के कार्यकर्ताओं सहित हजारों की संख्या में स्थानीय मांस-मछली व्यापारी सड़कों पर उतर आए। प्रदर्शनकारियों ने सिगरा स्थित नगर निगम मुख्यालय का जोरदार घेराव किया और परिसर के भीतर ही धरने पर बैठ गए। तनावपूर्ण स्थिति को देखते हुए मौके पर भारी संख्या में सिगरा थाना क्षेत्र की पुलिस तैनात रही।
नगर आयुक्त को सौंपा गया ज्ञापन, फैसले को बताया 'संवैधानिक अधिकारों पर हमला'
नागरिक समाज और विभिन्न संगठनों के प्रतिनिधिमंडल ने नगर आयुक्त को एक विस्तृत ज्ञापन सौंपकर इस एकतरफा प्रस्ताव को तत्काल निरस्त करने की मांग की। ज्ञापन में मुख्य रूप से निम्नलिखित बातें उठाई गईं:
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आजीविका का संकट: शहर के अधिकांश मांस-मछली विक्रेता छोटे और मध्यम वर्ग के हैं। दुकानों को 20 किलोमीटर दूर भेजने से उनका रोजगार पूरी तरह ठप हो जाएगा।
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संवैधानिक अधिकार का उल्लंघन: यह फैसला भारत के संविधान के अनुच्छेद 19(1)(g) के तहत प्रदत्त व्यापार और आजीविका के अधिकार के खिलाफ है।
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वैज्ञानिक विनियमन की मांग: प्रदर्शनकारियों का कहना है कि अगर समस्या स्वच्छता की है, तो दुकानों को हटाने के बजाय वहां बिजली, पानी, कचरा प्रबंधन, ग्रीन नेट, रेफ्रिजरेशन और कोल्ड स्टोरेज जैसी आधुनिक सुविधाएं दी जानी चाहिए।
"शराब और बड़ी कंपनियों से संस्कृति को खतरा नहीं?" - राघवेंद्र चौबे (महानगर अध्यक्ष, कांग्रेस)
प्रदर्शन का नेतृत्व कर रहे कांग्रेस के महानगर अध्यक्ष राघवेंद्र चौबे ने प्रशासन के रुख पर तीखा हमला बोला। उन्होंने कहा:
"हम अधिकारियों के पास ज्ञापन लेकर गए और उन्होंने आश्वासन दिया है कि कार्यसमिति की बैठक में इस पर निर्णय कराया जाएगा। प्रशासन का यह दोहरा रवैया बर्दाश्त नहीं होगा। आप बनारस की संस्कृति का हवाला देकर गरीबों को उजाड़ रहे हैं, लेकिन जब मंदिर के पास शराब बिकती है और शहर को नशे का अड्डा बनाया जाता है, तब संस्कृति खतरे में नहीं आती? यह फैसला केवल स्विगी, जोमैटो और स्पेंसर जैसी बड़ी ऑनलाइन मीट कंपनियों को फायदा पहुंचाने के लिए गरीब दुकानदारों पर थोपा जा रहा है।"
महिला कारोबारियों और आम नागरिकों के हक पर चोट: लता (स्त्री मुक्ति लीग)
स्त्री मुक्ति लीग की प्रतिनिधि लता ने इस फैसले को 'तुगलकी फरमान' बताते हुए कहा: "हम पहले भी दो बार ज्ञापन दे चुके हैं, लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई। इस व्यवसाय में बड़ी संख्या में महिलाएं टोकरी में मछली बेचकर अपने परिवार का पेट पालती हैं। वे रात को 20 किलोमीटर दूर से कैसे लौटेंगी? इसके अलावा, बनारस में रहने वाले बंगाली समुदाय सहित एक बड़े मांसाहारी वर्ग के भोजन के अधिकार पर भी यह हमला है, क्योंकि कोई भी व्यक्ति 1 किलो मछली खरीदने शहर से बाहर नहीं जाएगा।"
"यह हिंदू-मुस्लिम का नहीं, बड़ी पूंजी का खेल है" - दिशा छात्र संगठन
दिशा छात्र संगठन के कार्यकर्ताओं ने साफ किया कि इस मुद्दे को सांप्रदायिक रंग देने की कोशिश की जा रही है, जो बिल्कुल गलत है। उनके अनुसार, इस व्यापार से जुड़े और इसे खाने वाले लोगों में 80% से अधिक हिस्सेदारी हिंदू समुदाय की है। सरकार असल में छोटे दुकानदारों को हटाकर कॉरपोरेट घरानों को बनारस के मांस-मछली बाजार में लाना चाहती है।
आंदोलन तेज करने की दी चेतावनी
नगर निगम के अधिकारियों ने प्रदर्शनकारियों का ज्ञापन लेते हुए आश्वासन दिया है कि वे किसी को उजाड़ नहीं रहे हैं, बल्कि 'व्यवस्थित' कर रहे हैं। हालांकि, आंदोलनकारियों ने साफ शब्दों में चेतावनी दी है कि यदि इस फैसले को पूरी तरह वापस नहीं लिया गया और दुकानों को शहर के भीतर ही आधुनिक और वैज्ञानिक तरीके से नियमित नहीं किया गया, तो आने वाले दिनों में यह आंदोलन और उग्र रूप धारण करेगा।