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Varanasi: पुलिस कस्टडी में मौत मामले में 29 साल बाद आया कोर्ट का बड़ा फैसला, दो दरोगा और डॉक्टर दोषी करार

Varanasi Custodial Death Case: वाराणसी में पुलिस कस्टडी में मौत मामले में 29 साल बाद बड़ा फैसला, 2 दरोगा और डॉक्टर दोषी करार

 

वाराणसी: उत्तर प्रदेश की सांस्कृतिक राजधानी वाराणसी से इस वक्त एक बेहद बड़ी और ऐतिहासिक कानूनी खबर सामने आ रही है। वाराणसी की एक अदालत ने करीब 29 साल पुराने 'पुलिस हिरासत में मौत' (Custodial Death) के एक बेहद संवेदनशील मामले में अपना ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए तत्कालीन सुंदरपुर चौकी प्रभारी, मुकदमे के विवेचक (जांच अधिकारी) और पोस्टमार्टम करने वाले एक डॉक्टर को दोषी करार दिया है।

यह पूरा मामला साल 1997 का है, जब लंका थाना क्षेत्र की सुंदरपुर पुलिस चौकी में एक युवक की बेरहमी से पिटाई के बाद मौत हो गई थी। इस मामले में कुल 11 लोगों को आरोपी बनाया गया था, जिसमें से लंबी कानूनी लड़ाई के बाद अब तीन मुख्य किरदारों को दोषी ठहराया गया है।

क्या है पूरा मामला? (100 रुपये की चोरी का लगा था आरोप)

अभियोजन पक्ष और कोर्ट रिकॉर्ड के मुताबिक, साल 1997 में लंका पुलिस ने एक युवक को महज 100 रुपये की चोरी की आशंका (शक) के आधार पर हिरासत में लिया था। आरोप है कि सुंदरपुर चौकी में पूछताछ के दौरान पुलिसकर्मियों ने युवक पर बेइंतहा जुल्म ढाए और उसकी पीट-पीटकर हत्या कर दी।

मामले को दबाने के लिए पुलिस प्रशासन ने बेहद संगीन खेल खेला। युवक की मौत के बाद पुलिस ने आनन-फानन में उस पर चोरी का मुकदमा दर्ज कर दिया और परिजनों को बिना कोई सूचना दिए, रात के अंधेरे में ही शव का पोस्टमार्टम भी करवा दिया ताकि मामला बाहर न आ सके।

सीबीसीआईडी (CBCID) की जांच में खुला था पुलिसिया क्रूरता का राज

घटना के बाद पीड़ित परिवार ने न्याय की गुहार लगाते हुए कड़ा विरोध दर्ज कराया, जिसके बाद मामले की गम्भीरता को देखते हुए इसकी जांच सीबीसीआईडी (CBCID) को सौंप दी गई।

सीबीसीआईडी ने अपनी गहन तफ्तीश में पाया कि:

  • युवक की मौत स्वाभाविक नहीं थी, बल्कि हिरासत में प्रताड़ना और मारपीट की वजह से हुई थी।

  • मौत के बाद सबूतों और साक्ष्यों को मिटाने या छिपाने की सोची-समझी कोशिश की गई।

  • इसी जांच रिपोर्ट के आधार पर दोषी पुलिसकर्मियों और मददगारों के खिलाफ एफआईआर दर्ज की गई थी।

अदालत ने क्यों ठहराया डॉक्टर और दरोगाओं को दोषी?

अदालत ने मैराथन सुनवाई और गवाहों के बयानों के आधार पर पाया कि तत्कालीन सुंदरपुर चौकी प्रभारी और मुकदमे के विवेचक की भूमिका इस पूरे कस्टोडियल डेथ कांड में सीधे तौर पर संदिग्ध और दोषी थी।

इसके साथ ही, शव का पोस्टमार्टम करने वाले डॉक्टर को भी अदालत ने बराबर का दोषी माना। कोर्ट ने टिप्पणी की कि डॉक्टर ने अपनी रिपोर्ट में युवक की चोटों को छिपाकर उसकी मौत को 'आत्महत्या' का रूप देने का प्रयास किया था, ताकि आरोपी पुलिसकर्मियों को कानून के शिकंजे से बचाया जा सके।

11 आरोपियों में से 4 की हो चुकी है मौत

इंसाफ की इस लंबी लड़ाई में वक्त का एक बड़ा पहिया घूम चुका है। 29 साल के लंबे अंतराल के दौरान मुकदमे के कुल 11 आरोपियों में से 4 की मौत हो चुकी है, जबकि 2 आरोपियों को साक्ष्यों के अभाव में कोर्ट पहले ही दोषमुक्त (बरी) कर चुका है। अब बचे हुए तीन मुख्य आरोपियों को अदालत ने दोषी मान लिया है और उनकी सजा के बिंदु पर कोर्ट में आगे की कानूनी प्रक्रिया और बहस जारी है।