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रामनगर रामलीला का तीसरा दिन: ताड़का वध से गूंजा लीला स्थल, विश्वामित्र संग वन को निकले प्रभु श्रीराम और लक्ष्मण

काशी की ऐतिहासिक रामनगर रामलीला में उमड़ी श्रद्धालुओं की भीड़

 

भदैनी मिरर न्यूज़ डेस्क: वाराणसी के रामनगर की विश्वप्रसिद्ध रामलीला अपने पारंपरिक और दिव्य स्वरूप में आगे बढ़ रही है। रविवार को लीला के तीसरे दिन प्रभु श्रीराम के चरित्र का दर्शन करने के लिए भारी संख्या में श्रद्धालु और नेमी (नियमित दर्शनार्थी) रामनगर पहुंचे। शाम ढलते ही समूचा लीला स्थल 'जय श्रीराम' के उद्घोष से गुंजायमान हो उठा और भक्त रामचरितमानस की चौपाइयों के साथ भाव-विभोर नजर आए।

विश्वामित्र आगमन से लेकर ताड़का वध तक के प्रसंगों का सजीव मंचन

तीसरे दिन की लीला का शुभारंभ राजा दशरथ के दरबार से हुआ। महर्षि विश्वामित्र के आगमन पर राजा दशरथ ने उनकी अगवानी की और अपने चारों पुत्रों को उनका आशीर्वाद दिलाया। जब विश्वामित्र ने यज्ञ की रक्षा के लिए राम और लक्ष्मण को वन भेजने का आग्रह किया, तो राजा दशरथ व्याकुल हो उठे। हालांकि, गुरु वशिष्ठ की सीख पर उन्होंने भारी मन से दोनों राजकुमारों को भेजने की अनुमति दी।

वन पहुंचने पर जब राक्षसी ताड़का ने हमला किया, तो प्रभु श्रीराम ने एक ही बाण से उसका संहार कर दिया। ताड़का वध के साथ ही ऋषियों-मुनियों ने प्रसन्नता व्यक्त की। इसके बाद विश्वामित्र ने राम-लक्ष्मण को भूख-प्यास पर नियंत्रण पाने वाली विशेष मंत्र विद्या प्रदान की। तीसरे दिन की लीला में अहिल्या तारण, गंगा दर्शन, मिथिला प्रवेश और श्रीराम-जनक मिलन जैसे दिव्य प्रसंगों का भी मंचन हुआ।

1783 से कायम है ढाई सौ साल पुरानी अद्भुत परंपरा

रामनगर की इस रामलीला की शुरुआत वर्ष 1783 में तत्कालीन काशी नरेश महाराजा उदित नारायण सिंह ने कराई थी। लगभग 240 वर्षों से भी अधिक समय से यह परंपरा बिना किसी आधुनिक बदलाव के निरंतर जारी है। आज के आधुनिक दौर में भी यहां लाउडस्पीकर या माइक का प्रयोग नहीं होता और पात्र बिना किसी इलेक्ट्रॉनिक गैजेट के संवाद अदायगी करते हैं। रात्रि में लीला के दौरान पेट्रोमैक्स और मशालों की पारंपरिक रोशनी का उपयोग किया जाता है।

4 किलोमीटर के दायरे में घूम-घूमकर होती है रामलीला

इस रामलीला की सबसे बड़ी विशेषता इसका चलायमान स्वरूप है। करीब चार किलोमीटर के दायरे में अलग-अलग स्थानों को अयोध्या, जनकपुर और वन के रूप में ढाला जाता है। जैसे-जैसे प्रसंग बदलता है, पात्रों के साथ-साथ हजारों श्रद्धालुओं का काफिला भी एक स्थान से दूसरे स्थान की ओर बढ़ता है। देश-विदेश से आने वाले श्रद्धालु पूरे एक महीने तक रामनगर में रहकर इस अलौकिक आध्यात्मिक अनुभव का हिस्सा बनते हैं।