काशी में सोरहिया मेला शुरू: 16 दिन, 16 गांठ और 16 शृंगार के साथ महालक्ष्मी व्रत, जानें धार्मिक मान्यता व पूजन विधान
लक्ष्मीकुंड पर आस्था का सैलाब; पुत्र की दीर्घायु और समृद्धि के लिए 16 परिक्रमा करेंगी महिलाएं, मलमास के कारण नवविवाहिताएं नहीं करेंगी नए व्रत का नियम
वाराणसी (लक्सा) / भदैनी मिरर:
धर्म एवं अध्यात्म की नगरी काशी में शनिवार से प्रसिद्ध 'सोरहिया मेला' का शुभारंभ हो रहा है। लक्सा स्थित त्रिगुणात्मक सिद्धपीठ श्री महालक्ष्मी मंदिर और लक्ष्मीकुंड पर आगामी 16 दिनों तक महिलाएं कठिन व्रत रखकर धन की देवी महालक्ष्मी और संतान की रक्षा करने वाली जिउतिया माता (जीमूतवाहन) की आराधना करेंगी। भाद्रपद (भादों) शुक्ल पक्ष की अष्टमी यानी राधाष्टमी से शुरू होने वाला यह अनुष्ठान आश्विन कृष्ण पक्ष की अष्टमी (जीवित्पुत्रिका व्रत) तक निरंतर चलेगा।
उदया तिथि में शनिवार से व्रत, शुक्रवार को भी उमड़ी भीड़
शुक्रवार दोपहर 1:02 बजे ही भादों शुक्ल अष्टमी तिथि लगने के कारण कई श्रद्धालुओं ने उसी दिन से दर्शन-पूजन शुरू कर दिया, हालांकि उदया तिथि के मान के अनुसार मुख्य व्रत का संकल्प शनिवार से लिया जाएगा। महिलाओं ने मंदिर में पहुंचकर 16 गांठों वाला पवित्र धागा बांधा और मां लक्ष्मी के चरणों का आशीर्वाद लिया।
महालक्ष्मी मंदिर के महंत पं. शिव प्रसाद पांडेय 'लिंगिया महाराज' ने बताया कि 16 दिनों तक चलने वाले इस व्रत के समापन पर 3 अक्तूबर को जीवित्पुत्रिका (जिउतिया) का निर्जला व्रत रखा जाएगा, जिसका पारण 4 अक्तूबर को सुबह 7:28 बजे के बाद होगा।
16 शृंगार, 16 परिक्रमा और 16 दूर्वा का अद्भुत विधान
सोरहिया मेले की धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, व्रत रखने वाली महिलाएं प्रतिदिन लक्ष्मीकुंड में स्नान कर मंदिर परिसर में स्थित माता जिउतिया और महालक्ष्मी की पूजा करेंगी। पूजन के मुख्य नियम इस प्रकार हैं:
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16 गांठ का धागा: महिलाएं 16 गांठ वाला धागा धारण कर प्रतिदिन 16 आचमन करेंगी।
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16 परिक्रमा व अर्पण: देवी की 16 बार परिक्रमा करते हुए 16 चावल के दाने और 16 दूर्वा अर्पित किए जाएंगे।
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गंगा मिट्टी का मुखौटा: महिलाएं गंगा मिट्टी से निर्मित माता लक्ष्मी के मुखौटे को देवी के चरणों से स्पर्श कराकर घर ले जाती हैं और वर्षभर उसकी पूजा करती हैं। पुराने मुखौटे को कुंड या गंगा में विसर्जित किया जाता है।
मलमास के कारण नवविवाहिताएं नहीं कर सकेंगी नए व्रत की शुरुआत
महंत पं. शिव प्रसाद पांडेय ने स्पष्ट किया कि इस वर्ष मलमास (अधिकमास) पड़ने के कारण नवविवाहित महिलाएं इस वर्ष से नए सोरहिया व्रत का संकल्प नहीं ले सकती हैं। सनातन परंपरा के अनुसार मलमास वाले वर्ष में किसी भी नए महाव्रत का शुभारंभ करना शुभ नहीं माना जाता। इसलिए नए नियम से व्रत उठाने वाली महिलाएं अब अगले वर्ष से इसकी शुरुआत करेंगी।