Ramnagar Ramlila Day 7: रामनगर रामलीला में हुआ जनकपुर से सीता-राम की भावुक विदाई का मंचन
रामचरितमानस की चौपाइयों से गूंजी काशी: 'निज गिरा पावनि करन कारन...'; चारों राजकुमारों और वधुओं के आगमन पर अयोध्या में हुआ भव्य स्वागत
वाराणसी / भदैनी मिरर (संस्कृति डेस्क): विश्व प्रसिद्ध रामनगर की ऐतिहासिक रामलीला के सातवें दिन का प्रसंग अत्यंत भावुक, भक्तिमय और मंगलकारी रहा। एक ओर जहां जनकपुर की धरती से जानकी जी और उनकी बहनों की विदाई पर जनकपुरवासी अश्रुपूरित हो उठे, वहीं दूसरी ओर चारों नवविवाहित राजकुमारों और वधुओं के आगमन से पूरी अवधपुरी (अयोध्या) में आनंद और उल्लास छा गया।
रामलीला के दौरान काष्ठ जिह्वा स्वामी जी महाराज की परंपरा के अनुसार मानस की चौपाइयों का सस्वर गान किया गया:
"निज गिरा पावनि करन कारन राम जसु तुलसीं कह्यो।
रघुबीर चरित अपार बारिधि पारु कबि कौनें लह्यो॥"
"सिय रघुबीर बिबाहु जे सप्रेम गावहिं सुनहिं।
तिन्ह कहुँ सदा उछाहु मंगलायतन राम जसु॥"
अर्थात्, गोस्वामी तुलसीदास जी अपनी वाणी को पवित्र करने के लिए श्री राम जी का यश गाते हैं। सीता-राम के विवाह प्रसंग का जो लोग आदर और प्रेमपूर्वक गान व श्रवण करते हैं, उन्हें श्री जानकी जी और रघुनाथ जी की कृपा से सदा सर्वदा मंगल और सुख की प्राप्ति होती है।
जनकपुर से अश्रुपूरित विदाई और माता सुनैना का दुलार
सातवें दिन की लीला की शुरुआत चारों भाइयों—श्री राम, लक्ष्मण, भरत और शत्रुघ्न के माता सुनैना और महाराज जनक से विदा मांगने के प्रसंग से हुई। जैसे ही श्री राम ने नम्र भाव से हाथ जोड़कर विदाई मांगी, माता सुनैना अत्यंत अधीर हो उठीं। हालांकि, प्रभु राम के मुख से निकले अत्यंत मधुर और धैर्यपूर्ण शब्दों को सुनकर उनकी अधीरता शांत हुई।
इसके बाद शुभ मुहूर्त में महाराज जनक ने भारी और दुखी हृदय से चारों पुत्रियों—सीता, मांडवी, उर्मिला और श्रुतिकीर्ति को पालकी में बैठाकर अयोध्या के लिए विदा किया:
"राम बिदा मांगत कर जोरी। किन्ह प्रनामू बहोरी बहोरी।
प्रेमविवस परिवार सबू जानि सुलगं नरेश। कुंवरी चधाई पल्किन्ह सूमिरे सिद्धि गणेश॥"
अयोध्या में छाया उत्सव का माहौल
लीला का क्रम आगे बढ़ा और बारात अयोध्या पहुंची। राजमहल में माता कौशल्या, सुमित्रा और कैकेयी समेत पूरी अवधपुरी चारों राजकुमारों और नववधुओं के स्वागत में पलक-पावड़े बिछाए खड़ी नजर आई।
महल में प्रवेश के बाद अनेक विधि-विधान से सभी का आरती और स्वागत-सत्कार किया गया। विश्राम के समय जब माता कौशल्या ने प्रभु राम से यात्रा और धनुष भंग के प्रसंग पूछे, तो नम्रता के प्रतीक श्री राम ने उत्तर दिया कि— "यह सब कुछ आपके चरणों के प्रभाव और आशीर्वाद से ही संभव हुआ है और आगे भी होता रहेगा।"
महर्षि विश्वामित्र की विदाई के साथ आरती
अगले दिन की भोर होते ही महाराज दशरथ और चारों भाइयों ने परम आदर के साथ गुरु महर्षि विश्वामित्र जी को प्रणाम कर विदा किया, जिसके साथ ही सातवें दिन की कथा को विश्राम दिया गया। लीला के अंत में माता कौशल्या के स्वरूप द्वारा सभी आठों विग्रहों (चारों भाई और चारों वधुओं) की भव्य आरती उतारी गई।
आरती के दौरान समूचा रामलीला परिसर "जय-जय श्री सीता राम", "हर-हर महादेव" और "संत श्री गोस्वामी तुलसीदास जी महाराज की जय" के जयकारों से गुंजायमान हो उठा।