पीएम मोदी ने की 19 वर्षीय वेदमूर्ति देवव्रत रेखे की सराहना, काशी में 200 साल बाद हुआ दंडक्रम पारायण
अहिल्यानगर के युवा वैदिक छात्र ने 50 दिनों में बिना रुकावट शुक्ल यजुर्वेद के 2000 मंत्रों का दंडक्रम पारायण पूरा किया; श्रृंगेरी मठ ने सोने के आभूषण और एक लाख 11 हजार रुपये देकर किया सम्मानित
Updated: Dec 2, 2025, 14:37 IST
नई दिल्ली/वाराणसी। भारतीय वैदिक परंपरा और गुरु-शिष्य संस्कृति को नई ऊंचाई देने वाले महाराष्ट्र के अहिल्यानगर निवासी 19 वर्षीय वेदमूर्ति देवव्रत महेश रेखे ने इतिहास रचा है। उन्होंने 2 अक्टूबर से 30 नवंबर के बीच वाराणसी के वल्लभराम शालिग्राम सांगवेद विद्यालय में दंडक्रम पारायण पूरा किया। यह उपलब्धि काशी में लगभग 200 साल बाद संभव हुई है।
ऐतिहासिक रूप से दंडक्रम पारायण आखिरी बार 200 साल पहले महाराष्ट्र के नासिक में वेदमूर्ति नारायण शास्त्री देव द्वारा किया गया था। इस बार देवव्रत रेखे ने शुक्ल यजुर्वेद की माध्यंदिनी शाखा के 2000 मंत्रों का त्रुटिहीन, अखंड और वैदिक नियमों के अनुसार 50 दिनों में पाठ कर यह कठिन साधना पूरी की।
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने की सराहना
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोशल मीडिया पर देवव्रत रेखे की इस उपलब्धि की सराहना करते हुए लिखा—“19 साल के वेदमूर्ति देवव्रत महेश रेखे ने जो किया है, उसे आने वाली पीढ़ियां याद रखेंगी। भारतीय संस्कृति के प्रति समर्पित प्रत्येक व्यक्ति को गर्व है कि उन्होंने 2000 मंत्रों वाले दंडक्रम पारायण को बिना किसी रुकावट के पूरा किया।”
पीएम ने आगे कहा कि यह उपलब्धि काशी जैसे पावन नगर में पूरी होना अत्यंत सुखद है। उन्होंने देवव्रत के परिवार, संत-समुदाय, विद्वानों और उन सभी संगठनों का आभार व्यक्त किया जिन्होंने इस कठिन साधना में उन्हें सहयोग दिया।
श्रृंगेरी मठ ने किया विशेष सम्मान
देवव्रत के पिता महेश चंद्रकांत रेखे न केवल उनके अभिभावक हैं बल्कि उनके गुरु भी हैं। उनकी इस अद्वितीय साधना पर श्री श्रृंगेरी शारदा पीठ ने उन्हें विशेष रूप से सम्मानित किया।
जगद्गुरु शंकराचार्य ने उन्हें- सोने का आभूषण, ₹1,11,116 सम्मान राशि भेंट की।
उनके सम्मान में वाराणसी के रथयात्रा चौराहा से महमूरगंज तक भव्य शोभायात्रा निकाली गई, जिसमें बड़ी संख्या में वैदिक छात्र, आचार्य, संत और स्थानीय नागरिक शामिल हुए।
दंडक्रम पारायण क्यों महत्वपूर्ण?
दंडक्रम पारायण शुक्ल यजुर्वेद का अत्यंत कठिन, शास्त्रीय और साधना-प्रधान पाठ है। इसमें-
मंत्रों का क्रम विशेष नियमों पर आधारित होता है
उच्चारण 100% शुद्ध और त्रुटिहीन होना आवश्यक है
संपूर्ण अनुष्ठान अखंड और अविराम रखा जाता है
इसलिए इसे पूरा करना किसी भी वैदिक छात्र के लिए आध्यात्मिक उपलब्धि मानी जाती है।
काशी में 200 साल बाद की ऐतिहासिक साधना
काशी में इस पारायण का होना न केवल धार्मिक रूप से महत्वपूर्ण है बल्कि वैदिक परंपरा के पुनर्जागरण के रूप में भी देखा जा रहा है। देवव्रत रेखे की इस उपलब्धि ने काशी की आध्यात्मिक विरासत में नया अध्याय जोड़ दिया है।