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बीमार हो गये मरीजों के भगवान पद्मश्री डॉ. टीके लहरी, 15 दिन बाद अस्पताल प्रशासन ने ली सुधि

करीबी ने दी उनके बीमार होने की सूचना तब हरकत में आये लोग 

 

छाता और बैग लिए पैदल चलना और मरीजों की सेवा की मिशाल हैं डॉ. लहरी

जिन्होंने बीएचयू को बहुत कुछ दिया, देशभर में शिष्य है कई प्रोफेसर, उनके साथ ‘बेगानों‘ जैसा व्यवहार

वाराणसी, भदैनी मिरर। पृथ्वी के दूसरे भगवान कहे जाने वाले बीएचयू के जाने-माने कार्डियोथोरेसिक सर्जन पद्मश्री डॉ. टीके लहरी इन दिनों बीमार चल रहे हैं। मरीजों की सेवा के लिए पूरा जीवन समर्पित करनेवाले 86 वर्षीय इस महान शख्सियत की तबियत पिछले 15 दिन से खराब है। लेकिन इनके बीमार होने की खोज-खबर किसी ने नही ली। उनके करीबी ने जब सूचित किया तब बीएचयू प्रशासन सक्रिय हुआ। एम्बुलेंस से उन्हें लाकर भर्ती कराया गया है। इसे बीएचयू प्रशासन की संवेदनहीनता के रूप में देखा जा रहा है। 

बताते हैं कि डॉ. लहरी मंगलवार को उनके एक करीबी अहमद अली ने इसकी जानकारी आईएमएस निदेशक को दी। इसके बाद तो हड़कंप मच गया। आनन- फानन शाम को एंबुलेंस के साथ मेडिकल टीम उनके नरिया स्थित आवास पहुंची और सुपर स्पेशियलिटी ब्लॉक के सीटीवीएस डिपार्टमेंट के आईसीयू में भर्ती कराया। बीएचयू परिसर के पास नरिया गेट के सामने मेडिकल इन्क्लेव गेट में डॉ. लहरी का आवास है। इसी परिसर में आईएमएस बीएचूय के निदेशक प्रो. एसएन संखवार समेत कई वरिष्ठ चिकित्सक भी रहते हैं। इसके बाद भी वह 15 दिन तक ‘बेगानो‘ जैसे रहे। मरीजों की निःस्वार्थ सेवा करनेवाले इस महान व्यक्ति के बारे में जो भी सुनता है उसका मन उनके प्रति सम्मान से भर उठता है। डॉ. लहरी के करीबी अहमद अली को जब उनकी पीड़ा देखी नहीं गई, तब उन्होंने ईएमएस निदेशक को सूचित किया। बाकायदा उनके कार्यालय जाकर जानकारी दी। तब जाकर उनके इलाज की व्यवस्था हुई। 

कोलकाता में जन्मे प्रख्यात कार्डियोथोरेसिक सर्जन डॉ. लाहिड़ी ने चिकित्सा के क्षेत्र में न केवल उत्कृष्ट योगदान दिया, बल्कि मानवता और परोपकार की एक अद्वितीय मिसाल भी हैं। उन्होंने वर्ष 1969 में इंग्लैंड से कार्डियक सर्जरी में एफआरसीएस तथा 1972 में उसी संस्थान से थोरेसिक सर्जरी में एमसीएच की उपाधि हासिल की। उन्होंने विवाह नही किया। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के परिसर के पास विश्वविद्यालय द्वारा उपलब्ध कराये गये आवास में आज भी सन्त की तरह रहते हैं। चौकी पर सोते हैं। नियत समय पर घर से दो किमी चलकर बीएचयू अस्पताल जाना और मरीजों को देखना वह कभी नही भूलते। वह अपने पेंशन का भी एक हिस्सा बीएचयू को दान दे देते हैं। बनारस के लोग उन्हें देवता की तरह मानते हैं। वे इतने स्वाभिमानी और राजनीति आदि से निर्लिप्त हैं कि जनवरी 2018 में प्रदेश के मुख्यमन्त्री योगी आदित्यनाथ से भी मिलने से मना कर दिया था।

डॉ. लहरी बीएचयू से 2003 में सेवानिवृत्त हुए। रिटायरमेंट के बाद भी वे लगातार घर से पैदल सुपरस्पेशियलिटी ब्लॉक की ओपीडी में आते हैं। सेवा काल के दौरान हजारों मरीजों के हृदय की सर्जरी कर चुके डॉ. लहरी की खासियत है कि वह ओपीडी जाना नहीं भूलते। एप्रन पहने डॉक्टर लहरी को नरिया गेट से एनसीसी बटालियन वाली लेन, त्रिवेणी गर्ल्स हॉस्टल, एलडी गेस्ट हाउस चौराहा, कुलपति आवास के सामने से एमएस जाते देखा जा सकता है। एक हाथ में काला बैग, दूसरे हाथ में छाता उनकी पहचान बन चुकी है। उन्हें 2006 में पद्मश्री सम्मान दिया गया। उन्हें मरीजों और परिजनों के लिए बने अन्नपूर्णा भोजनालय में साधारण ढंग से जाकर 25 रूपये थाली का भोजन करते हुए भी देखा जा सकता है। आईएमएस बीएचयू और देश के विभिन्न भागों में उनके पढ़ाई कई प्रोफेसर हैं। अक्खड़पन के वह मिसाल हैं। वहीं दो जोड़ी कपड़े, चौकी पर सोना। तमाम सुख-सुविधाएं देनेवाले मौजूद हैं लेकिन संत का जीवन उन्हें ज्यादा पसंद है।