वासंतिक नवरात्र की चतुर्थी पर आस्थावानों की उमड़ी भीड़, शृंगार गौरी और देवी कूष्मांडा के दर्शन को पहुंचे भक्त
ज्ञानवापी स्थित शृंगार गौरी विग्रह और दुर्गाकुंड के कूष्मांडा मंदिर में तड़के से शुरू हुआ दर्शन-पूजन, भक्तों ने मनोकामना पूर्ति की कामना की
Mar 22, 2026, 10:48 IST
वाराणसी, भदैनी मिरर। वासंतिक नवरात्र की चतुर्थी तिथि पर काशी में भक्ति और आध्यात्म की अनूठी छटा देखने को मिली। रविवार को बड़ी संख्या में भक्तों ने ज्ञानवापी परिसर के पीछे स्थित शृंगार गौरी विग्रह का दर्शन-पूजन किया। भोर से ही श्रद्धालु लाइन में लगकर भगवती के शृंगार गौरी स्वरूप का अभिषेक, पुष्पांजलि और अर्चना कर आशीर्वाद लेते रहे। कई धार्मिक संगठनों ने भी समूहिक रूप से दर्शन-पूजन किया।
इसी क्रम में दुर्गाकुंड स्थित प्राचीन कूष्मांडा मंदिर में भी चतुर्थी पर विशेष भीड़ उमड़ी। मान्यता है कि वासंतिक नवरात्र की चतुर्थी पर देवी विंध्यवासिनी एक दिन के लिए काशी प्रवास करती हैं और उनका प्रवास देवी कूष्मांडा के विग्रह में माना जाता है। इसी आस्था को लेकर भक्तों ने मां कूष्मांडा के दर्शन कर विंध्यवासिनी का पुण्य भी अर्जित किया।
कूष्मांडा मंदिर के पुजारी सोनू झा ने बताया कि नवरात्र में नौ दिनों तक मां भगवती के नौ रूपों की आराधना होती है, जबकि काशी में नौ देवियां एक साथ विराजित मानी जाती हैं। उन्होंने कहा कि मां कूष्मांडा अत्यंत शांत और शक्तिशाली स्वरूप में काशी के मध्य भाग में विराजमान हैं। केवल गुड़हल की कली का एक पुष्प अर्पित करने मात्र से भक्तों की मनोकामना पूर्ण होने की मान्यता है।
उन्होंने बताया कि यह मंदिर तंत्र-मंत्र साधना से भी संबंधित है और भक्त विशेष तौर पर आराधना कर अपनी मनोकामनाओं की पूर्ति की कामना करते हैं। पुजारी ने यह भी कहा कि इस समय विश्व में चल रहे संघर्षों के बीच लोग देश में शांति और सुरक्षा की कामना लेकर भी माता के दरबार में आ रहे हैं।
मां के प्रिय प्रसाद के बारे में उन्होंने बताया कि देवी को अड़हुल का फूल और भोग में हलवा अत्यंत प्रिय है।
मान्यता है कि नवरात्र में की गई प्रार्थना का फल छह महीने बाद आने वाले शारदीय नवरात्र तक जरूर मिलता है।