मसाने की होली या बहुरूपियों, सोशल मीडिया से कमाई करनेवालों का खेल
बड़ा सवाल : काशी में पुरातन काल से कब मनाई गई मसाने की होली
जिस महाश्मशान से गुजरने से लोग सहम जाते थे आज वहां कैसे मनने लगा उत्सव
वाराणसी, भदैनी मिरर। काशी में मसाने की होली की परम्परा पुरातन काल से कभी नही रही। काशीवासी यह बात जानते हैं। लेकिन मसाने की होली पर हुड़दंड और नशे के कारोबार के आरापों और विरोध के बावजूद शुक्रवार को हरिश्चंद्र घाट पर 27 फरवरी 2026 को ’मसाने की होली’ मनाई गई। रंगभरी एकादशी के उपलक्ष्य में लोगों ने महाश्मशान में चिता की राख (भस्म) उड़ाकर और एक-दूसरे को लगाकर भगवान शिव के साथ इस अनोखे उत्सव का आनंद लिया। भक्तों ने कथित परंपरा के अनुसार श्मशान की चिताओं की राख से होली खेली। तमाम बहुरूपिये इसमें शामिल हुए। सेल्फी कल्चर और अपने ह्वाट्सअप, फेसबुकर, इंस्टाग्राम और अन्य सोशल साइटों पर वीडियो चलानेवालों की भरमार रही। कथित परम्परा के नाम पर हरिश्चंद्र घाट पर महाश्मशान नाथ की पूजा और आरती हुई। हालांकि इन आयोजकों की ओर से यह तर्क दिया गया कि श्मशाननाथ की आरती के बाद काशी की होली की शुरूआत होती है। जबकि काशी की होली की शुरूआत रंगभरी एकादशी के दिन बाबा विश्वनाथ के साथ अबीर-गुलाल की होली के साथ शुरूआत होती है। कहने के लिए उत्सव में अघोरी, तांत्रिक, संन्यासी और बड़ी संख्या में स्थानीय श्रद्धालु शामिल हुए। लेकिन इसमें ऐसी कथित अघोरी भी दिखे जो आमदिनों ने श्मशान के नाम पर उल्टे पांव भाग जाते हैं। उनके परिवारवाले तक विरोध करते हैं। लेकिन रील बनाने की चाह उन्हें ऐसा करने के लिए विवश कर रही है।
मसाने की होली के नाम पर शुरू की गई इस नई परम्परा के बारे में तर्क वही पुराना होता है कि रंगभरी एकादशी पर बाबा विश्वनाथ माता पार्वती के साथ काशी लौटते हैं और अपने गणों (भूत-प्रेत) के साथ श्मशान में भस्म से होली खेलते हैं। लेकिन यह तो काशी विश्वनाथ मंदिर के लिए है। लेकिन इसी को बहाना बनाकर धंधेबाजों ने अपने भी कमाई का जुगाड़ खोज लिया। इसका सबूत यह है कि काशी के किसी पुरनिये से पूछे तो वह साफ बता देगा कि ऐसी कोई परम्परा नही रही। मगर इन धंधेबाजों ने अपनी कमाई के साधन के लिए इसे परम्परा का नाम दे दिया। हुआ भी वही जो होना था। क्योंकि अनुमति देनेवाले प्रशासन को भी नही पता कि यह प्रचीन परम्परा है या नही। फिर भी हरिश्चंद्र घाट की मसाने की होली मनी। सच तो यही है कि काशी की लीलाओं में लाग-विमान निकालने वाले और धर्म की ओट लेकर अपना रोजगार चलानेवालों ने अपना काम कर लिया और प्रशासन मूकदर्शक बनी रही।
अब आइए यह जानिए कि इस कथित परम्परा के नाम पर मनाई गई मसाने की होली कैसे मनी। सुबह से ही घाट पर भीड़ उमड़ी, इसमे ंकथित अघोरी, नागा साधु, तांत्रिक और आम श्रद्धालु शामिल हुए। जमकर रालीलाओं की तरह लाग-विमान निकले। एक से एक महाअघोरी दिखे जो पहले काशीवासियों को नही दिखते रहे। रील बनाने के आशिकों की भरमार रही। जमकर गीत-संगीत के बीच मसाने की होली मनाई गई। उत्साह गजब का था, लेकिन रील बनाने की खुमारी साफ दिख रही थी। इस उत्सव में ऐसे तमाम लोग दिखे जिनको यदि वास्तविक एकांतवाले श्मशान में रात को बैठा दिया जाय तो उनकी पैंट गीली हो जायेगी या हार्ट अटैक भी आ सकता है। ऐसे लोग काशी के चकाचौंध वाले महाश्मशान पर गुलछर्रे उड़ा रहे थे। वहीं काशी के वास्तविक अघोरियों का कहना था कि यदि यह वास्तविक अघोरी हैं तो थोड़ा अगल-बगल के सुनसान वाले श्मशान पर भी मस्ती करने जांय। हकीकत का पता चल जायेगा। यदि काशी में यह परम्परा रही है तो बगल के मिर्जापुर, चंदौली, भदोही में भी यह कथित अघोरी ऐसे उत्सव बनाना क्यों नही उचित समझते। वह स्थान जहां अपने परिजनों को खोने के अथाह गम मे डूबे लोग शव लेकर आते हैं और वहां यह बाबा विश्वनाथ की गौरा के विदाई के बहाने ‘तमाशा‘ या यह कह लिजिए कि सोशल मीडिया पर अपनी कमाई का जरिया बना ये हुए है।
लेकिन दुहाई पुरातन परम्परा की है। सच यही है कि काशी के मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाट पर कभी ऐसी परम्परा नही रही। लोग इन घाटों से गुजरने में सहम जाते थे। आज लाईट आदि के पर्याप्त बंदोवस्त हो चुके हैं। चकाचौंध है तो मस्ती हो रही है। यही महाश्मशान कभी वीरान हुआ करता था तो कोई घाट के किनारे से गुजरने में भी दस बार सोचता था। यदि परिवार वालों का पता चल गया कि श्मशान की ओर से कोई घर आया है तो उसे स्नान और पवित्र करने के उपाय के बाद ही घर में प्रवेश करने दिया जाता था। लेकिन बाबा के नाम पर कुछ भी कर लो। गौरतलब है कि काशी के डोमराजा परिवार ने पिछले दिनों डीएम से मिलकर परम्परा के नाम पर हो रहे इस खिलवाड़ पर ब्रेक लगाने की मांग की थी और अनुमति न दिये जाने का अनुरोध किया था। डोमराजा परिवार के अधीन मणिकर्णिका और हरिश्चंद्र घाट दोनों आते हैं। लेकिन हरिश्चंद्र घाट की मसाने की होली मन गई। प्रशासन मौन है।