वाराणसी: मणिकर्णिका घाट पर धधकती चिताओं के बीच नगरवधुओं का नृत्यार्चन, सैकड़ों साल पुरानी परंपरा निभी
वाराणसी। धर्म, अध्यात्म और परंपराओं की नगरी काशी में एक बार फिर आस्था और वैराग्य का अद्भुत संगम देखने को मिला। मणिकर्णिका घाट पर वासंतिक नवरात्र की सप्तमी तिथि पर धधकती चिताओं के बीच नगरवधुओं ने नृत्यार्चन कर सदियों पुरानी परंपरा को जीवंत किया।
राग और विराग का अनूठा संगम
उत्तरवाहिनी गंगा के तट पर जलती चिताओं के बीच जहां जीवन की नश्वरता स्पष्ट दिख रही थी, वहीं घुंघरुओं की झंकार और संगीत की गूंज भक्ति और मुक्ति की कामना को अभिव्यक्त कर रही थी।
नगरवधुओं ने पूरी श्रद्धा और भावनाओं के साथ बाबा श्मशाननाथ को नृत्यांजलि अर्पित की। देर रात तक यह आयोजन चलता रहा और आसपास के घाटों तक इसकी गूंज सुनाई देती रही।
तांत्रिक विधि से हुआ पंचमकार पूजन
आयोजन के समापन से पहले बाबा श्मशाननाथ का तांत्रिक विधि से पंचमकार पूजन किया गया। पांच ब्राह्मणों ने पूरे विधि-विधान के साथ पूजन संपन्न कराया।
बाबा महाश्मशान सेवा समिति के अध्यक्ष चैनु प्रसाद गुप्ता ने बताया कि यह परंपरा वर्षों से चली आ रही है, जिसे हर साल श्रद्धा के साथ निभाया जाता है।
रातभर चला नृत्य और संगीत
नृत्यांजलि के दौरान नगरवधुएं भावविभोर होकर प्रस्तुति देती रहीं। भक्ति गीतों और संगीत की धुनों ने पूरे माहौल को आध्यात्मिक बना दिया।
कार्यक्रम में समिति के पदाधिकारी और बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे।
ऐसे शुरू हुई परंपरा
इस अनूठी परंपरा की शुरुआत 16वीं शताब्दी में हुई थी, जब राजा मानसिंह ने श्मशाननाथ मंदिर का निर्माण कराया था।
मंदिर निर्माण के बाद संगीतार्चन के लिए कलाकारों को आमंत्रित किया गया, लेकिन श्मशान स्थल होने के कारण कोई भी तैयार नहीं हुआ। तब नगरवधुओं ने स्वयं आगे आकर पूरी रात नृत्य किया और बाबा से अगले जन्म में इस जीवन से मुक्ति की प्रार्थना की।
तब से यह परंपरा हर वर्ष निरंतर निभाई जा रही है।
आस्था और परंपरा का अद्भुत प्रतीक
मणिकर्णिका घाट पर होने वाला यह आयोजन काशी की अनूठी सांस्कृतिक विरासत और आध्यात्मिक परंपरा का प्रतीक है, जहां जीवन और मृत्यु के बीच भक्ति का अद्भुत संगम देखने को मिलता है।