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काशी सेवा - पितृ सेवा: वाराणसी में माता-पिता की अनदेखी करने वाली संतानों को अब कोर्ट सिखाएगा सबक

वाराणसी भरण-पोषण अधिकरण की अनूठी पहल: सिर्फ गुजारा भत्ता नहीं, अब सेवा भी है जरूरी

 

वाराणसी (भदैनी मिरर): धर्म और संस्कृति की नगरी काशी में अब बुजुर्गों और वरिष्ठ नागरिकों के साथ लापरवाही बरतने वाले विधिक वारिसों (संतानों) पर कानून का डंडा एक नए और सुधारात्मक रूप में चलने जा रहा है। एसडीएम सदर (पीठासीन अधिकारी, भरण-पोषण न्यायालय) ने वरिष्ठ नागरिकों के भरण-पोषण एवं कल्याण अधिनियम, 2007 के तहत एक ऐतिहासिक कदम उठाते हुए "काशी सेवा - पितृ सेवा" नामक एक नया कम्युनिटी सर्विस मॉडल तैयार किया है।

अब यदि कोई संतान अपने वृद्ध माता-पिता या आश्रित बुजुर्गों की देखभाल में लापरवाही बरतती है, तो कोर्ट केवल उन पर मेंटेनेंस (गुजारा भत्ता) का जुर्माना नहीं लगाएगा, बल्कि उन्हें अनिवार्य रूप से सामुदायिक सेवा (Community Service) करने का आदेश भी देगा।

क्या है "काशी सेवा - पितृ सेवा" अभियान?

एसडीएम सदर ने एक साक्षात्कार में बताया कि काशी (वाराणसी) ऐतिहासिक रूप से पूरे भारतवर्ष से वृद्धजनों के लिए जीवन का अंतिम पड़ाव व्यतीत करने का एक पवित्र केंद्र रहा है। यहाँ की परंपरा को ध्यान में रखते हुए यह नई पहल की गई है।

इस व्यवस्था के तहत जिन मामलों में संतानों की लापरवाही सामने आएगी, उन्हें प्रति सप्ताह निर्धारित दिन और कुछ घंटे (जैसे सप्ताह में 2 दिन, प्रतिदिन 2 घंटे) वाराणसी के विभिन्न वृद्ध आश्रमों, ओल्ड एज होम्स (जैसे रामनगर या सारनाथ स्थित संस्थान) या नगर निगम के जोनों में जाकर अनिवार्य रूप से निःशुल्क सेवाएं देनी होंगी।

सजा का स्वरूप: बुजुर्गों से बात करने से लेकर बागवानी तक करने का आदेश

यह कोई सामान्य प्रशासनिक दंड नहीं है, बल्कि एक सुधारात्मक न्याय है ताकि संतानों के भीतर आत्मचिंतन और सेवा भाव जागृत हो सके। इसके तहत निम्नलिखित कार्य कराए जाएंगे:

  • एल्डरली केयर (बुजुर्गों की देखभाल): ओल्ड एज होम में अकेले रह रहे बुजुर्गों के पास जाकर उनसे बातचीत करना और उनके लिए एक सकारात्मक माहौल (Lively Environment) बनाना।

  • परिसर का रखरखाव: संस्थानों में साफ-सफाई, बागवानी (Gardening) और वृक्षारोपण करना।

  • नगर निगम में सहयोग: नगर निगम के विभिन्न जोनों (जैसे भेलूपुर, कोतवाली, वरुणापार) के अंतर्गत स्वच्छता कार्यों और पार्कों के रखरखाव में हाथ बंटाना।

📌 विशेष नियम: विशेष जैकेट, कैप और जियो-टैग उपस्थिति अनिवार्य

इस व्यवस्था को पारदर्शी और कड़ा बनाने के लिए कोर्ट ने सख्त नियम बनाए हैं:

  1. पहचान: कम्युनिटी सर्विस के दौरान संबंधित व्यक्ति को एक मानकीकृत विशेष जैकेट और कैप पहननी होगी, जो भरण-पोषण अधिकरण द्वारा जारी की जाएगी।

  2. जियो-टैग हाजिरी: सेवा देने वाले व्यक्ति को संस्थान के हेड के सामने हाजिरी लगानी होगी और जियो-टैग (Geo-Tagged) फोटो कोर्ट के समक्ष प्रस्तुत करनी होगी ताकि स्थान और समय की सत्यता प्रमाणित हो सके।

  3. सर्टिफिकेट: कार्य पूरा होने पर संबंधित संस्थान के निदेशक/अधिकारी या जिला समाज कल्याण अधिकारी की रिपोर्ट के बाद ही कोर्ट अंतिम पूर्णता प्रमाणपत्र जारी करेगा। अनुपालन न करने पर सख्त कानूनी कार्रवाई की जाएगी।

फरियादी सीधे नहीं, संस्थान के माध्यम से ले सकेंगे सहायता

जब मीडिया द्वारा यह पूछा गया कि क्या पीड़ित बुजुर्ग या आम जनता इन सेवा देने वाले व्यक्तियों से सीधे संपर्क कर सकती है? तो एसडीएम सदर ने स्पष्ट किया कि:

"इसके लिए किसी सार्वजनिक हेल्पलाइन नंबर की आवश्यकता नहीं है। कोर्ट द्वारा नामित किए गए व्यक्ति सीधे चिन्हित वृद्धाश्रमों या नगर निगम के जोनल कार्यालयों में स्वयं उपस्थित होंगे। वहाँ के संस्थान प्रमुख (Director/Zonal Officer) अपनी आवश्यकता के अनुसार बुजुर्गों की सहायता के लिए इन्हें तैनात करेंगे। आम जनता या पीड़ित समाज कल्याण अधिकारी या नगर निगम के अधिकारियों के माध्यम से इस पूरी प्रक्रिया की जानकारी ले सकते हैं।"

वाराणसी प्रशासन की यह पहल देश के अन्य हिस्सों के लिए भी एक नजीर साबित हो सकती है, जहाँ बुजुर्गों के अधिकारों की रक्षा के साथ-साथ संतानों को उनके नैतिक कर्तव्यों का पाठ सुधारात्मक तरीके से पढ़ाया जा रहा है।