संकट मोचन संगीत समारोह: जब जसपिंदर नरूला के 'सबद' और 'सूफियाना कलाम' से भीग गई काशी
बारिश की फुहारें और आस्था के सुर, श्रोता हुए भाव-विभोर
वाराणसी। संकट मोचन मंदिर की पावन अंगनाई में संगीत समागम की तीसरी निशा भक्ति और सुरों के अनूठे मेल की गवाह बनी। समारोह की तीसरी प्रस्तुति में जब पद्मश्री जसपिंदर नरूला मंच पर आईं, तो फिल्मी पार्श्व गायिका के ठप्पे से इतर उनका आध्यात्मिक स्वरूप निखर कर सामने आया। 'हे गोविंद-हे गोपाल' के सबद और सूफियाना कलामों के बीच श्रोता ऐसे रमे कि बारिश की फुहारें भी उन्हें डिगा न सकीं।
हवा की लहरों में प्रभु का संदेश
जसपिंदर नरूला ने भजन 'मनवा रे जीवन है संग्राम, भज ले राम राम राम' और 'सूरज की गर्मी से तपते हुए तन को' जैसे कालजयी गीतों से शुरुआत की। जब ठंडी हवा के झोंकों के बीच उन्होंने सुर साधा, तो रोमांच के साथ कहा-"हवा भी हमारी बात प्रभु तक पहुंचाने को आतुर है।" मंदिर के परिक्रमा पथ पर बैठे ग्रामीण अंचलों के बुजुर्ग हों या आंगन में डटे युवा, हर कोई ताल से ताल मिलाता दिखा।
मंदिर में गुरुद्वारे सा दृश्य: सर्वधर्म समभाव का संदेश
प्रस्तुति के दौरान एक क्षण ऐसा आया जब मंदिर का प्रांगण गुरुद्वारे की आध्यात्मिक शांति में बदल गया। अपनी पारिवारिक पृष्ठभूमि (पिता सिख और माता ब्राह्मण) का जिक्र करते हुए जसपिंदर ने सिर पर आंचल रखा और संगतकारों सहित श्रोताओं से भी सिर ढकने का आग्रह किया। दुर्लभ सबद 'हे गोविंद हे गोपाल हे दयानिधान' की शुरुआत होते ही वर्षा की बूंदें गिरने लगीं, जिसे गायिका ने 'देवराज इंद्र की प्रसन्नता' बताया।
शास्त्रीय संगीत के दिग्गजों ने घोला सुरों का अमृत
इस संगीत निशा में केवल भक्ति रस ही नहीं, बल्कि शास्त्रीय गायन और वादन की शुद्धता ने भी श्रोताओं को बांधे रखा।
- पं. उल्हास कसालकर (राग भोपाली): समारोह की प्रथम प्रस्तुति में वरिष्ठ गायक पं. उल्हास कसालकर ने राग भोपाली की बारीकियों को जिया। विलंबित लय की बंदिश और कोमल निषाद के सूक्ष्म प्रयोग ने उनके 'ज्ञानवृद्ध' होने का प्रमाण दिया।
- विवेक सोनार (बांसुरी वादन): पंडित हरिप्रसाद चौरसिया के शिष्य विवेक सोनार ने राग बागेश्वरी में अपनी कला का प्रदर्शन किया। नौ मात्रा वाले 'मत्त ताल' और ध्रुपद अंग की बढ़त ने सोने में सुगंध घोलने का काम किया।
- कौशिकी चक्रवर्ती (राग आभोगी): नौ साल बाद संकट मोचन पहुंचीं कौशिकी चक्रवर्ती ने मध्यरात्रि के राग आभोगी से समां बांध दिया। विलंबित झूमरा ताल और आलापचारी में सुरों की शुद्धता ने परिसर को तालियों की गड़गड़ाहट से भर दिया।
कौन हैं पद्मश्री जसपिंदर नरूला?
14 नवंबर 1970 को जन्मीं जसपिंदर नरूला हिंदुस्तानी शास्त्रीय, सूफी और गुरबाणी संगीत की जानी-मानी हस्ताक्षर हैं। उन्हें 1999 में फिल्म 'प्यार तो होना ही था' के लिए सर्वश्रेष्ठ गायिका का पुरस्कार मिला। कला के क्षेत्र में उनके योगदान को देखते हुए जनवरी 2025 में भारत सरकार ने उन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया। संगीत निर्देशक कल्याणजी और विजू शाह के मार्गदर्शन में उन्होंने बंटी और बबली और मिशन कश्मीर जैसी फिल्मों में यादगार गीत दिए हैं।