आजादी के आंदोलन में संघ व जनसंघ का योगदान: काकोरी कांड के नायक की अनोखी दास्तां
काकोरी कांड की 101वीं वर्षगांठ: जब संघ और जनसंघ के विधायक बने स्वतंत्रता संग्राम के महानायक शचींद्र नाथ बख्शी, शहर दक्षिणी में पहली बार फहराया था भगवा
वाराणसी (भदैनी मिरर ब्यूरो): 9 अगस्त 1925 को अंजाम दिए गए ऐतिहासिक 'काकोरी ट्रेन एक्शन' की 101वीं वर्षगांठ के अवसर पर देश के स्वतंत्रता संग्राम और उसके बाद के राजनीतिक इतिहास से जुड़ा एक महत्वपूर्ण पहलू सामने आता है। अक्सर जब यह सवाल उठाया जाता है कि आजादी की लड़ाई में भारतीय जनसंघ, संघ या वर्तमान भारतीय जनता पार्टी की वैचारिक पृष्ठभूमि का क्या योगदान रहा, तो इसका सबसे सशक्त उत्तर काशी के लाल और काकोरी कांड के प्रमुख सूत्रधारों में से एक शचींद्र नाथ बख्शी के जीवन चरित्र में मिलता है।
दी बनारस बार के पूर्व महामंत्री एडवोकेट नित्यानंद राय की विशेष रिसर्च के अनुसार, काकोरी कांड के महानायक शचींद्र नाथ बख्शी ने आजादी के बाद भारतीय जनसंघ के प्रत्याशी के रूप में वाराणसी शहर दक्षिणी विधानसभा सीट से चुनाव जीतकर पहली बार क्षेत्र में भगवा परचम लहराया था।
समुद्र में 5 किमी तैरकर लाए थे जर्मन माउजर की खेप
शचींद्र नाथ बख्शी का जन्म 25 दिसंबर 1904 को बनारस में हुआ था। देश सेवा के संकल्प के कारण उन्होंने इंटरमीडिएट की पढ़ाई छोड़ दी और युवाओं को संगठित करने के लिए 'सेंट्रल हेल्थ यूनियन' की स्थापना की। क्रांतिकारी दल 'हिंदुस्तान रिपब्लिकन एसोसिएशन' (HRA) के सक्रिय सदस्य के रूप में उन्होंने कई साहसिक अभियानों का नेतृत्व किया।
उनसे जुड़ा एक ऐतिहासिक प्रसंग यह भी है कि चंद्रशेखर आजाद जिस माउजर का उपयोग करते थे और जिससे सांडर्स का वध हुआ था, उस जर्मन मेड माउजर की खेप को भारत लाने के लिए शचींद्र नाथ बख्शी कोलकाता तट से लगभग 5 किलोमीटर दूर अंतरराष्ट्रीय समुद्री सीमा में तैरकर गए थे। वहां से वे माउजर का कंसाइनमेंट सुरक्षित निकालकर लाए थे।
काकोरी कांड में जेल से लेकर आजाद भारत में जनसंघ तक का सफर
काकोरी ट्रेन एक्शन के बाद जब मुख्य अभियुक्तों पर मुकदमा चल रहा था, तब सचीन दा फरारी की हालत में भागलपुर से गिरफ्तार किए गए। स्पेशल जज जे.आर.डब्लू. बैनेट की अदालत में चले पूरक मुकदमे के तहत 13 जुलाई 1927 को उन्हें आजीवन कारावास (कालापानी) की सजा सुनाई गई।
1937 में जेल से रिहा होने के बाद उन्होंने शुरुआत में कांग्रेस के साथ काम किया, लेकिन आजादी के बाद देश की तत्कालीन परिस्थितियों और कांग्रेस की नीतियों से उनका मोहभंग हो गया।
इसके बाद जनसंघ और संघ के विचारकों ने स्वतंत्रता सेनानी शचींद्र नाथ बख्शी के प्रति सम्मान व्यक्त करते हुए उन्हें राजनीतिक मंच प्रदान किया।
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1972 का ऐतिहासिक चुनाव: वाराणसी शहर दक्षिणी सीट पर 1951 से ही सीपीआई और कांग्रेस का प्रभाव था। 1972 के विधानसभा चुनाव में भारतीय जनसंघ ने शचींद्र नाथ बख्शी को मैदान में उतारा। उन्होंने वामपंथी दिग्गज रुस्तम सैटिन को पराजित कर इस विधानसभा सीट पर पहली बार भगवा झंडा फहराया।
"क्रांतिकारियों का वास्तविक सम्मान जनसंघ और भाजपा ने किया"
एडवोकेट नित्यानंद राय का कहना है कि आजादी के बाद जहां कई सत्ताधारी दलों ने क्रांतिकारियों की उपेक्षा की और उन्हें उनका वाजिब हक नहीं दिया, वहीं संघ और जनसंघ ने काकोरी कांड के इस जीवित महानायक को पूरा मान-सम्मान दिया और उन्हें जनप्रतिनिधि बनाकर विधानसभा भेजा।
उन्होंने देश के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी (जो वाराणसी से सांसद भी हैं) और उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ से मांग की है कि काकोरी कांड के महानायक शचींद्र नाथ बख्शी के योगदान को राष्ट्रीय व अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पाठ्यक्रम और स्मारकों के माध्यम से प्रमुखता से प्रचारित-प्रसारित किया जाए। 23 नवंबर 1984 को 80 वर्ष की आयु में सुल्तानपुर में अंतिम सांस लेने वाले इस महान क्रांतिकारी का जीवन भारतीय इतिहास का एक अमूल्य अध्याय है।