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UGC इक्विटी रूल्स पर केंद्र करेगा पुनर्विचार, डॉ. मृत्युंजय तिवारी की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का बड़ा हस्तक्षेप

विश्वविद्यालय अनुदान आयोग के विवादित समानता नियमों पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी के बाद केंद्र सरकार का फैसला; बीएचयू छात्रनेता डॉ. मृत्युंजय तिवारी समेत अन्य याचिकाकर्ताओं की ओर से दी गई चुनौतियों पर सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई।

 

भदैनी मिरर डिजिटल डेस्क, नई दिल्ली/वाराणसी: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) के वर्ष 2026 के समानता नियमों (Equity Regulations) को लेकर चल रहे देशव्यापी विवाद में एक नया और बड़ा मोड़ सामने आया है। केंद्र सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को सूचित किया है कि वह इन विवादित नियमों पर पुनर्विचार करने और इनकी दोबारा समीक्षा के लिए एक उच्चस्तरीय समिति गठित करने पर विचार कर रही है। सुप्रीम कोर्ट में बीएचयू (काशी हिंदू विश्वविद्यालय) के प्रखर छात्रनेता और पोस्ट-डॉक्टोरल शोधकर्ता डॉ. मृत्युंजय तिवारी, सामाजिक कार्यकर्ता राहुल दीवान एवं अधिवक्ता विनीत जिंदल द्वारा दायर याचिकाओं की सुनवाई के दौरान यह महत्वपूर्ण बात सामने आई।

सुप्रीम कोर्ट का सख्त रुख और सरकार को सुझाव

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ के समक्ष हुई सुनवाई में शीर्ष अदालत ने स्पष्ट शब्दों में कहा कि नियमों का ढांचा ऐसा होना चाहिए, जिससे सभी विद्यार्थियों के हितों की रक्षा हो सके और किसी भी वर्ग के मन में असुरक्षा, आशंका या असंतोष की भावना न पनपे। पीठ ने सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता को सुझाव दिया कि आने वाली पीढ़ी के व्यापक हितों को सुरक्षित रखने के लिए इन नियमों पर नए सिरे से विचार किया जाना बेहद जरूरी है। इसके जवाब में केंद्र सरकार की ओर से अदालत को आश्वस्त किया गया कि सरकार एक समीक्षा समिति के गठन पर गंभीरता से विचार कर रही है।

BHU छात्रनेता डॉ. मृत्युंजय तिवारी की याचिका क्यों है अहम?

इस पूरे मामले में बीएचयू के छात्रनेता डॉ. मृत्युंजय तिवारी की सुप्रीम कोर्ट में दायर याचिका की मुख्य भूमिका रही है। याचिकाकर्ताओं ने मुख्य रूप से यूजीसी नियमों के नियम 3(सी) की वैधानिकता पर गंभीर सवाल उठाए हैं।

याचिका में तर्क दिया गया है कि इस प्रावधान के तहत जाति आधारित भेदभाव को केवल अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के सदस्यों के खिलाफ होने वाले भेदभाव तक ही सीमित कर दिया गया है। इससे सामान्य वर्ग के वे विद्यार्थी कानूनी सुरक्षा के दायरे से बाहर हो जाते हैं, जिन्हें भी जातिगत आधार पर भेदभाव या उत्पीड़न का सामना करना पड़ सकता है। इसके अलावा, डॉ. मृत्युंजय तिवारी व अन्य याचिकाकर्ताओं ने अदालत के समक्ष यह मुद्दा भी मजबूती से उठाया कि नियमों में झूठी और भ्रामक शिकायतें दर्ज कराने वालों के खिलाफ कार्रवाई की कोई ठोस व्यवस्था नहीं की गई है, जिससे इन नियमों के दुरुपयोग की पूरी आशंका बनी हुई थी।

जनवरी में सुप्रीम कोर्ट ने लगा दी थी रोक

गौरतलब है कि यूजीसी ने 13 जनवरी 2026 को इन नियमों को अधिसूचित किया था। हालांकि, इनके प्रावधानों की अस्पष्टता और एकतरफा रुख को देखते हुए डॉ. मृत्युंजय तिवारी सहित अन्य याचिकाकर्ताओं ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया था। मामले की गंभीरता को देखते हुए शीर्ष अदालत ने इसी वर्ष 29 जनवरी को इन नियमों के क्रियान्वयन पर अंतरिम रोक लगा दी थी और 2012 के भेदभाव विरोधी नियमों को ही बहाल रखने का निर्देश दिया था।

आंदोलन से लेकर अदालत तक संघर्ष

यूजीसी के इन नए नियमों को लेकर देश भर के उच्च शिक्षण संस्थानों और सवर्ण छात्र संगठनों में भारी आक्रोश देखने को मिला था। दिल्ली स्थित यूजीसी मुख्यालय पर छात्रों के उग्र प्रदर्शनों और बीएचयू छात्रनेता डॉ. मृत्युंजय तिवारी द्वारा सुप्रीम कोर्ट में उठाए गए कानूनी कदमों का ही परिणाम है कि आज केंद्र सरकार को इन नियमों की समीक्षा के लिए समिति बनाने पर विवश होना पड़ा है। अब देखना यह होगा कि समीक्षा समिति द्वारा तैयार की जाने वाली नई नियमावली सभी वर्गों के विद्यार्थियों को समान न्याय और सुरक्षा प्रदान करने में कितनी खरी उतरती है।