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काशी के 'अपना घर आश्रम' से रिश्तों की कड़वी सच्चाई: सालभर में 55 बुजुर्गों की मौत

वाराणसी में बुजुर्गों के साथ संवेदनहीनता की हद; दुबई से लेकर बड़े कारोबारी परिवारों के बेटे केवल डेथ सर्टिफिकेट, गहने और जमीन के कागजात के लिए पहुंचे आश्रम।

 

वाराणसी (भदैनी मिरर): मोक्ष की नगरी काशी में रिश्तों के बिखरने और कलयुगी संवेदनहीनता का एक ऐसा कड़वा सच सामने आया है, जो किसी का भी दिल दहला दे। वाराणसी स्थित प्रसिद्ध 'अपना घर आश्रम' में पिछले एक साल के भीतर 275 से अधिक आवासित बुजुर्गों में से 55 बुजुर्गों की मृत्यु हो गई।

हैरान और व्यथित करने वाली बात यह है कि इन बुजुर्गों को जब तक सांसें चलती रहीं, तब तक उनके सगे बेटों और परिजनों ने मुड़कर भी नहीं देखा। लेकिन जैसे ही आश्रम से उनकी मृत्यु की खबर गई, वही परिजन प्रॉपर्टी पर कब्जा जमाने, जमीन की रजिस्ट्री कराने, गहने ले जाने और लाखों रुपये के बीमा क्लेम (Insurance Claim) को हासिल करने के लिए तुरंत शव व मृत्यु प्रमाण पत्र लेने पहुंच गए।

मौत के बाद तुरंत आए, लेकिन सामान और गहने भी ले जाना नहीं भूले

अपना घर आश्रम के संस्थापक व संचालक डॉ. के. निरंजन बताते हैं कि अपनों का शव या मृत्यु प्रमाण पत्र (Death Certificate) ले जाने के पीछे का असली मकसद सिर्फ संपत्ति का बंटवारा या बीमा क्लेम हासिल करना होता है। जो लोग जीते जी अपने बुजुर्ग माता-पिता को देखने तक नहीं आते, वे मृत्यु के बाद उनका सामान, पैसे, गहने और कपड़े तक समेटकर ले जाते हैं।

हालांकि, आश्रम की पारदर्शी व्यवस्था के तहत पहले दिन से ही हर बुजुर्ग के सामान को टैग करके रखा जाता है और फोटो खींची जाती है।

महिला बुजुर्गों की स्थिति और भी दयनीय है। आश्रम में रह रहीं 275 महिलाओं में से किसी की मौत होने पर ससुराल, मायका और पति—तीनों ही शव लेने से साफ इनकार कर देते हैं।

मामले जो कर देंगे भावुक: रिश्तों की कड़वी दास्तानें

  • दुबई से आया बेटा, लेकिन केवल शव लेने: बेनियाबाग के 65 वर्षीय बुजुर्ग को लावारिस हालत में आश्रम में पनाह मिली थी। उनका बेटा दुबई में नौकरी करता है। बीमार होने पर परिजनों को बार-बार सूचना दी गई, लेकिन कोई नहीं आया। मौत होते ही बेटा दो दिन के भीतर दुबई से आकर शव ले गया।

  • तीन सराफा दुकानें, 5 बीघा जमीन... अंतिम सांसें आश्रम में: दरभंगा के 70 वर्षीय सराफा कारोबारी परिवार से तंग आकर काशी आ गए थे। गंगा घाट पर बेहोश मिलने पर उन्हें आश्रम लाया गया था। उनके पास अकूत संपत्ति थी, लेकिन कोई देखने नहीं आया। मृत्यु के बाद रिश्तेदार तुरंत शव लेने पहुंच गए।

  • 50 लाख का बीमा क्लेम भुनाने अगले ही दिन पहुंचा बेटा: देवरिया के 60 वर्षीय बुजुर्ग जमींदार परिवार से थे। उन्होंने अपने नाम पर 50 लाख रुपये का बीमा करा रखा था। 3 साल से आश्रम में रह रहे बुजुर्ग की अस्पताल में भर्ती रहने के बावजूद बेटे ने सुध नहीं ली, लेकिन मौत के अगले ही दिन शव लेने आ पहुंचा।

  • 105 साल की मां को ठुकराया: आश्रम में 105 साल की एक बुजुर्ग महिला रह रही हैं, जिन्होंने अपने सौतेले बेटे को गोद लेकर पाला-पोसा। जब आश्रम से बेटे को मां से मिलने के लिए कहा गया, तो उसने जाति का अजीब बहाना बनाकर आने से साफ इनकार कर दिया।

पितृपक्ष में मृत पूर्वजों को नमन करने वाली काशी की धरती से सामने आई यह खबर समाज में बुजुर्गों के प्रति गिरती मानवीय संवेदनाओं पर एक बड़ा और गंभीर सवाल खड़ा करती है।