BHU में CCS नियमों पर बड़ा विवाद: 20 साल से लागू बताए जा रहे नियम ‘अवैध’, शिक्षकों को खुला पत्र
पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. ओम शंकर का दावा—BHU में कभी लागू ही नहीं हुए CCS नियम, 2007 का परिपत्र बताया गैरकानूनी; सैकड़ों कर्मचारियों पर हुई कार्रवाई पर उठे सवाल
वाराणसी। बनारस हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) में केंद्रीय सिविल सेवा (CCS) आचरण नियमों को लेकर एक बड़ा विवाद सामने आया है। विश्वविद्यालय के पूर्व विभागाध्यक्ष डॉ. ओम शंकर ने 16 मार्च 2026 को शिक्षकों और कर्मचारियों के नाम जारी एक खुले पत्र में दावा किया है कि BHU में CCS (आचरण) नियम 1964 और CCS (CCA) नियम 1965 कभी विधिवत लागू ही नहीं किए गए।
उन्होंने आरोप लगाया कि वर्ष 2007 में जारी एक रजिस्ट्रार परिपत्र के माध्यम से इन नियमों को अवैध रूप से विश्वविद्यालय के शिक्षकों और कर्मचारियों पर थोप दिया गया, जिसके आधार पर पिछले दो दशकों में सैकड़ों कर्मचारियों के खिलाफ कार्रवाई की गई।
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2007 का परिपत्र बताया ‘पूरे विवाद की जड़’
खुले पत्र में कहा गया है कि 13 जुलाई 2007 को जारी पत्र संख्या R/VCS/07-08/437 इस पूरे विवाद की आधारशिला है। आरोप है कि इस परिपत्र के जरिए वेतन संशोधन से जुड़े UGC निर्देश को गलत तरीके से आचरण नियम के रूप में प्रस्तुत किया गया।
डॉ. ओम शंकर के अनुसार:
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यह परिपत्र कार्यकारी परिषद की मंजूरी के बिना जारी किया गया
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केवल गैर-शिक्षण कर्मचारियों से जुड़े निर्देश को सभी पर लागू बताया गया
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रजिस्ट्रार ने अपने अधिकार क्षेत्र से बाहर जाकर नियम लागू करने की कोशिश की
RTI में नहीं मिला कोई ठोस प्रमाण
पत्र में दावा किया गया है कि सूचना के अधिकार (RTI) के तहत मांगी गई जानकारी में BHU प्रशासन कोई ऐसा दस्तावेज प्रस्तुत नहीं कर सका, जिससे यह साबित हो कि कार्यकारी परिषद ने कभी CCS नियमों को अपनाया था।
कोर्ट के फैसलों का हवाला
इस पूरे मामले में कई महत्वपूर्ण न्यायिक निर्णयों का भी जिक्र किया गया है, जिनमें कहा गया है कि:
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केंद्रीय विश्वविद्यालयों के शिक्षक “सरकारी सेवक” की श्रेणी में नहीं आते
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CCS नियमों का दायरा उन पर लागू नहीं होता
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विश्वविद्यालय कर्मचारियों के सेवा विवादों में CAT (Central Administrative Tribunal) का अधिकार क्षेत्र भी नहीं है
संवैधानिक अधिकारों के उल्लंघन का आरोप
खुले पत्र में यह भी कहा गया है कि CCS नियमों के लागू होने से शिक्षकों और कर्मचारियों के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन हुआ है, जिनमें शामिल हैं:
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अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता (अनुच्छेद 19)
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समानता का अधिकार (अनुच्छेद 14)
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गरिमा के साथ जीवन जीने का अधिकार (अनुच्छेद 21)
20 वर्षों की कार्रवाई पर उठे सवाल
पत्र में दावा किया गया है कि पिछले 20 वर्षों में CCS नियमों के आधार पर की गई सभी अनुशासनात्मक कार्यवाहियां—जैसे निलंबन, वेतन कटौती या निष्कासन—कानूनी रूप से शून्य मानी जा सकती हैं।
कर्मचारियों से की गई अपील
डॉ. ओम शंकर ने BHU के शिक्षकों और कर्मचारियों से अपील की है कि:
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अपने मामलों से जुड़े दस्तावेज सुरक्षित रखें
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RTI के माध्यम से सच्चाई सामने लाएं
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किसी भी कार्रवाई के खिलाफ कानूनी सलाह लें
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जरूरत पड़ने पर उच्च न्यायालय में याचिका दायर करें
BHU प्रशासन पर उठे बड़े सवाल
इस खुलासे के बाद BHU प्रशासन की कार्यप्रणाली और पिछले दो दशकों में लिए गए फैसलों पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। यदि ये आरोप सही साबित होते हैं, तो यह मामला विश्वविद्यालय के इतिहास के सबसे बड़े प्रशासनिक विवादों में शामिल हो सकता है।