छात्रों-शिक्षकों पर जुल्म, अपने चहेते अफसर उप कुलसचिव पर रहम: BHU प्रशासन के दोहरे रवैये से परिसर में आक्रोश
लंका थाने में एफआईआर दर्ज होने के बाद भी ए. वेलू पर कार्रवाई नहीं, जांच कमेटी का भी पता नहीं
शिकायती पत्र वायरल होते ही प्रोफेसर पर तुरंत गिरी थी गाज, दोहरे रवैये से BHU में आक्रोश
छात्रों के आंदोलन पर अनुशासनहीनता का नोटिस, चहेते अधिकारियों पर मेहरबानी को लेकर उठ रहे सवाल
वाराणसी (भदैनी मिरर)। काशी हिंदू विश्वविद्यालय (BHU) में इन दिनों प्रशासनिक कार्यप्रणाली और उनके फैसलों को लेकर तरह-तरह की चर्चाएं व्याप्त हैं। एक ओर जहां आम शिक्षकों और छात्रों के खिलाफ शिकायतों या आंदोलनों पर प्रशासन का तुरंत कड़ा रुख देखने को मिलता है, वहीं विश्वविद्यालय के कुछ उच्च अधिकारियों पर गंभीर आरोप लगने के बाद भी चुप्पी साध ली जाती है। इस दोहरे रवैये को लेकर छात्रों और शिक्षकों के बीच भारी आक्रोश पनप रहा है।
उप कुलसचिव पर गंभीर आरोप, फिर भी प्रशासन मौन
विश्वविद्यालय के उप कुलसचिव ए. वेलू (A. Velu) हाल ही में अपनी पत्नी द्वारा दर्ज कराई गई एक एफआईआर (FIR) के कारण चर्चा में आए हैं। ए. वेलू की पत्नी ने वाराणसी के लंका थाने में मुकदमा दर्ज कराया है, जिसमें उन्होंने एक महिला नर्सिंग अधिकारी के साथ अवैध संबंध और मानसिक प्रताड़ना के गंभीर आरोप लगाए हैं।
सूत्रों के मुताबिक, थाना स्तर पर मुकदमा दर्ज होने के बाद भी विश्वविद्यालय प्रशासन ने अब तक न तो संबंधित अधिकारी को कोई कारण बताओ नोटिस जारी किया है और न ही कोई मेमो थमाया है। हद तो यह है कि मामले की आंतरिक निष्पक्ष जांच के लिए अब तक किसी जांच कमेटी तक का गठन नहीं किया गया है।
प्रोफेसर पर तुरंत एक्शन, मंदिर प्रबंधक पद से हटाया था
वहीं दूसरी ओर, इस मामले के ठीक विपरीत बीएचयू परिसर स्थित श्री विश्वनाथ मंदिर के मानद प्रबंधक प्रो. ब्रज भूषण ओझा के खिलाफ प्रशासनिक कार्रवाई में असाधारण तेजी दिखाई गई थी। कुलपति ने पिछले दिनों सोशल मीडिया पर वायरल हुए एक शिकायती पत्र के आधार पर ही प्रो. ओझा को तत्काल प्रभाव से पद से मुक्त कर दिया था।
उल्लेखनीय है कि शिकायतकर्ता ने बीएचयू पुलिस चौकी में तहरीर देकर आरोप लगाया था कि संपूर्णानंद संस्कृत विश्वविद्यालय के संबद्ध कॉलेज में नौकरी दिलाने के नाम पर प्रो. ब्रज भूषण ओझा ने चार लाख रुपये लिए थे। इस मामले में बिना विस्तृत जांच के ही तुरंत कदम उठा लिया गया।
छात्रों के आंदोलन पर अनुशासनहीनता की कार्रवाई
प्रशासन के इस विरोधाभासी रवैये से छात्र-छात्राओं में गहरा असंतोष है। छात्रों का कहना है कि जब वे अपनी जायज मांगों या परिसर की समस्याओं को लेकर लोकतांत्रिक तरीके से आवाज उठाते हैं या आंदोलन करते हैं, तो उन्हें तुरंत 'अनुशासनहीनता' का ठप्पा लगाकर कारण बताओ नोटिस थमा दिया जाता है।
एक तरफ जहां अपने चहेते अफसरों पर गंभीर कानूनी मामलों के बावजूद मेहरबानी बरसाई जा रही है, वहीं दूसरी तरफ छात्रों और अन्य शिक्षकों के खिलाफ बिना विलंब कठोर कदम उठाए जा रहे हैं। विश्वविद्यालय में अब यह सवाल जोर-शोर से उठ रहा है कि क्या बीएचयू में नियम और कानून व्यक्तियों का पद देखकर तय किए जा रहे हैं?