"जनु महि लुठत सनेह समेटा..." — जब वशिष्ठ जी ने केवट को गले लगाकर मिटा दिए जाति-पांति के सारे बंधन
चित्रकूट में हुआ अति भावुक भरत-मिलाप, लक्ष्मण जी का उद्वेग और वशिष्ठ जी द्वारा केवट का अलौकिक आलिंगन
भदैनी मिरर, वाराणसी। विश्वप्रसिद्ध रामनगर की विश्व धरोहर रामलीला के बारहवें दिन की कथा का श्रीगणेश भरद्वाज मुनि के आश्रम से हुआ। प्रभु श्री राम को अयोध्या वापस लाने के संकल्प के साथ भरत जी, मुनि भरद्वाज से चित्रकूट प्रस्थान की आज्ञा लेते हैं।
देवलोक में उथल-पुथल और देवगुरु बृहस्पति की सीख
जब भरत जी अपने विशाल लश्कर के साथ चित्रकूट की ओर बढ़ते हैं, तब स्वर्ग लोक में खलबली मच जाती है। देवराज इंद्र इस भय से चिंतित हो उठते हैं कि यदि श्री राम और भरत जी का मिलन हो गया तो राम का वनवास समाप्त हो जाएगा और राक्षसों के संहार का कार्य अधूरा रह जाएगा।
इंद्र की चिंता देख देवगुरु बृहस्पति उन्हें समझाते हुए कहते हैं- "हे इंद्र! यदि श्री हरि के परम भक्त भरत जी के प्रति कोई छल या कपट करोगे, तो वह तुम पर ही भारी पड़ेगा। भगवान अपना बुरा करने वाले को तो क्षमा कर देते हैं, किंतु अपने भक्त का अहित करने वाले को उनकी क्रोधाग्नि भस्म कर देती है।" गुरु बृहस्पति के इस ज्ञानवर्धक उपदेश के बाद इंद्र देव भरत जी की महिमा की वंदना करते हैं।
यमुना पार कर चित्रकूट प्रस्थान और कोल-भीलों का संवाद
इसके पश्चात सभी अयोध्यावासी और चतुरंगिनी सेना के साथ भरत जी यमुना पार करते हैं। मार्ग में वनवासी कोल-भील जब भरत और शत्रुघ्न जी को देखते हैं, तो उन्हें श्री राम और लक्ष्मण जी का प्रतिबिंब नज़र आता है।
* कुछ वनवासी कहते हैं कि ये रूप-रंग में राम-लक्ष्मण जैसे ही हैं, पर इनके साथ सेना है और माता सीता नहीं हैं।
* तभी कोई बताता है कि ये श्री राम के छोटे भ्राता भरत जी हैं, जो प्रभु को मनाने वन आए हैं।
* कुछ लोग भावुक होकर कहते हैं कि कैसे माता-पिता होंगे जिन्होंने ऐसे सुंदर बालकों को वन भेजा, वहीं अन्य कहते हैं कि यह हमारा परम सौभाग्य है जो हमें इनके दर्शन प्राप्त हुए।
लक्ष्मण जी का उद्वेग, आकाशवाणी और प्रभु राम की सहज समझ
चित्रकूट पहुँचकर एक कोल श्री राम को सूचना देता है कि विशाल सेना के साथ भरत जी आ रहे हैं। यह सुनते ही लक्ष्मण जी भड़क उठते हैं और उद्वेग में आकर कहते हैं कि भरत आपको अकेला पाकर राज्य निष्कंटक करने के लिए आक्रमण करने आ रहे हैं, मैं उनसे युद्ध करूँगा।
तभी आकाशवाणी होती है कि लक्ष्मण जी को बिना विचारे कोई कार्य नहीं करना चाहिए। प्रभु श्री राम भी लक्ष्मण जी को शांत करते हुए समझाते हैं कि भरत को स्वप्न में भी राज्य का लोभ नहीं हो सकता।
भावुक भरत-मिलाप और आश्रम आगमन
निषादराज जब भरत जी को प्रभु श्री राम की पर्णकुटी दिखाते हैं, तो लक्ष्मण जी दूर से प्रणाम करते भरत जी को देखकर प्रभु से कहते हैं कि भरत जी प्रणाम कर रहे हैं। यह सुनते ही श्री राम और लक्ष्मण जी सब कुछ भूलकर नंगे पांव भरत जी की ओर दौड़ पड़ते हैं।
प्रभु श्री राम अत्यंत प्रेमपूर्वक भरत जी को गले लगाते हैं। इसके बाद श्री राम, लक्ष्मण और सीता जी सभी माताओं और अयोध्यावासियों से मिलकर प्रणाम करते हैं।
विशेष आध्यात्मिक प्रसंग: वशिष्ठ-निषादराज भेंट और भक्ति का गूढ़ तत्व
आज की लीला में एक अत्यंत गूढ़ सामाजिक एवं आध्यात्मिक संदेश भी देखने को मिला। जब भरत जी प्रथम बार निषादराज से मिले थे, तब उन्होंने सहर्ष आलिंगन किया था, परंतु महर्षि वशिष्ठ शायद तत्कालीन सामाजिक संस्कारों की औपचारिकता में आलिंगन से संकोच कर गए थे।
किंतु जब चित्रकूट में महर्षि वशिष्ठ ने देखा कि स्वयं भगवान श्री राम निषादराज को अपने हृदय से लगा रहे हैं, तो उन्हें अपनी उस संकोच रूपी त्रुटि का भान हुआ। गोस्वामी तुलसीदास जी ने इस अलौकिक क्षण का वर्णन रामचरितमानस में अति सुंदर चौपाई से किया है:
प्रेम पुलकि केवट कहि नामू। कीन्ह दूरि तें दंड प्रनामू॥
राम सखा रिषि बरबस भेंटा। जनु महि लुठत सनेह समेटा॥
प्रेम से पुलकित होकर निषादराज ने दूर से ही अपना नाम लेकर महर्षि वशिष्ठ को दंडवत प्रणाम किया। परंतु महर्षि वशिष्ठ ने उन्हें 'राम का सखा' मानकर बलपूर्वक उठाकर अपने हृदय से लगा लिया—मानो भूमि पर लोटते हुए साक्षात प्रेम को ही समेट लिया हो।
यह प्रसंग सिद्ध करता है कि जिसे प्रभु श्री राम अपना मान लेते हैं, वह जाति, कुल, ज्ञान-अज्ञान के सभी बंधनों से परे हो जाता है। जिसके हृदय में श्री राम के प्रति अनन्य प्रेम है, वह परम पवित्र है।
पितृ शोक और लीला का विश्राम
आश्रम पहुँचने पर जब श्री राम को पिता राजा दशरथ के देवलोक गमन का समाचार मिलता है, तो वे अत्यंत व्यथित होते हैं। तत्पश्चात मंदाकिनी नदी के तट पर जलांजलि व तर्पण किया जाता है और सभी स्नान करते हैं।
नगरवासियों और कोल-भीलों के बीच सुंदर संवाद के साथ आज की कथा का विश्राम होता है। बारहवें दिन की पावन आरती का सौभाग्य निषादराज जी को प्राप्त हुआ।