काशी विश्वनाथ मंदिर में चढ़ावा चोरी और भ्रष्टाचार का आरोप: वाराणसी में वकीलों का जोरदार प्रदर्शन
बनारस बार एसोसिएशन ने जिला प्रशासन को सौंपा ज्ञापन; मंदिर प्रबंधन के अधिकारियों की आय जांच और VIP दर्शन बंद करने की उठी मांग
वाराणसी (भदैनी मिरर ब्यूरो): अयोध्या के बाद अब धर्मनगरी वाराणसी में भी मंदिर प्रबंधन को लेकर विवाद गरमा गया है। रामधन गबन की घटना और श्री काशी विश्वनाथ मंदिर में चढ़ावा चोरी व वित्तीय अनियमितताओं के गंभीर आरोपों को लेकर वाराणसी के अधिवक्ताओं ने शुक्रवार को जिला मुख्यालय पर जबरदस्त विरोध-प्रदर्शन किया। बनारस बार एसोसिएशन के बैनर तले जुटे वकीलों ने जिलाधिकारी कार्यालय के बाहर जमकर नारेबाजी की और जिला प्रशासन को एक 6 सूत्रीय मांग पत्र सौंपा। जिलाधिकारी की अनुपस्थिति में एडीएम (ADM) ने वकीलों का यह ज्ञापन प्राप्त किया।
"गिनाए जा रहे नोट पारदर्शी तरीके से Google पर लाइव हों"
बनारस बार एसोसिएशन के जनरल सेक्रेटरी (महासचिव) नित्यानंद राय ने मंदिर प्रबंधन पर सीधा हमला बोलते हुए कहा कि मंदिर में चढ़ावे की गिनती की प्रक्रिया पूरी तरह संदेहास्पद है। प्रशासन का तर्क है कि मुमुक्षु भवन की बुजुर्ग महिलाएं नोटों की गिनती करती हैं, लेकिन नित्यानंद राय ने इस पर आपत्ति जताते हुए कहा, "मुमुक्षु भवन में रहने वाली महिलाएं वृद्ध और जर्जर हैं, जो वहां मोक्ष की कामना से आती हैं। कई लोगों को ठीक से दिखाई या सुनाई नहीं देता, उनके हाथ कांपते हैं। ऐसे में वे नोट कैसे गिन सकती हैं? यह सिर्फ एक बहानेबाजी है।"
अधिवक्ताओं ने मांग की है कि नोटों की गिनती की प्रक्रिया को पूरी तरह पारदर्शी बनाया जाए। इसे सीसीटीवी कैमरों के सामने गिना जाए और डे-टू-डे (रोजाना) के आंकड़ों को इंटरनेट और गूगल (Google) पर सार्वजनिक किया जाए, ताकि कोई भी नागरिक पारदर्शिता देख सके।
अधिकारियों की संपत्ति की जांच और तबादले की मांग
प्रदर्शनकारी वकीलों का आरोप है कि काशी विश्वनाथ कॉरिडोर बनने के बाद से मंदिर प्रबंधन से जुड़े कुछ अधिकारी और कर्मचारी वहां 'सर्वेसर्वा' बनकर बैठ गए हैं। ज्ञापन में मांग की गई है कि:
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पिछले 5 वर्षों से मंदिर प्रबंधन, प्राइवेट एजेंसियों और सिक्योरिटी में तैनात सभी अधिकारियों-कर्मचारियों के नाम, पते और आय को सार्वजनिक किया जाए।
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इनकी नियुक्ति से पहले और बाद की संपत्ति की गहनता से जांच की जाए।
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कोई भी अधिकारी या कर्मचारी वहां स्थाई घर न बनाने पाए, इसलिए 3 से 4 साल से जमे लोगों का तत्काल नियमित स्थानांतरण (तबादला) किया जाए।
सुप्रीम कोर्ट के 1997 के आदेश के तहत हो ट्रस्ट का गठन
वकीलों ने मंदिर के बोर्ड ऑफ ट्रस्टी (Board of Trustees) के वर्तमान स्वरूप पर भी गंभीर सवाल उठाए। महासचिव ने कहा कि 1981 में मंदिर में चोरी के बाद सरकार ने 'काशी विश्वनाथ टेम्पल एक्ट 1983' के तहत इसका प्रबंधन हाथ में लिया था। साल 1997 में माननीय सर्वोच्च न्यायालय (Supreme Court) ने इस पर अंतिम फैसला सुनाया था, जिसमें काशी नरेश और शृंगेरी के शंकराचार्य जैसे हाई-प्रोफाइल लोग ट्रस्टी थे। आज वह ट्रस्ट 'लो-प्रोफाइल' में कैसे बदल गया? वकीलों ने मांग की कि सुप्रीम कोर्ट की मंशा के अनुरूप बोर्ड ऑफ ट्रस्टी का पुनर्गठन हो और इसकी बैठकें नियमित व सार्वजनिक की जाएं।
वीआईपी (VIP) व्यवस्था बंद करने और स्थानीय लोगों के लिए अलग गेट की मांग
अधिवक्ताओं ने मंदिर परिसर में वीआईपी दर्शन व्यवस्था को पूरी तरह से बंद करने की वकालत की। उन्होंने मांग उठाई कि 'काशीवासियों' के लिए एक अलग प्रवेश द्वार (गेट) निर्धारित किया जाए, ताकि विश्वनाथ धाम बनने से पहले जिस सहजता से बनारस के लोग बाबा विश्वनाथ का दर्शन-पूजन करते थे, उसी प्रकार की परंपरा फिर से बहाल हो सके। इसके अलावा गर्भ गृह के चारों तरफ लगे सीसीटीवी कैमरों का डिस्प्ले सार्वजनिक करने और दर्शन के नाम पर दलाली करने वाले तत्वों (चाहे वे पुलिसकर्मी ही क्यों न हों) पर सख्त दंडात्मक कार्रवाई की मांग की गई है।
"ईमानदारी से खर्च होता तो सोने की काशी बन जाती"
नित्यानंद राय ने तीखे लहजे में कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की जनभावनाओं के अनुरूप यह प्रत्यावेदन दिया गया है, क्योंकि भ्रष्टाचार की वजह से बदनामी सरकार की हो रही है। उन्होंने कहा, "अयोध्या में लोगों ने कहा कि यदि सारा पैसा सही से खर्च होता तो सोने की अयोध्या बन जाती। मेरा भी यही कहना है कि जितना पैसा मोदी जी ने बनारस को भेजा, अगर वो ईमानदारी से जमीन पर लगता तो आज सोने की काशी हो गई होती, लेकिन यहाँ हर प्रोजेक्ट में भ्रष्टाचार है।" वकीलों ने चेतावनी दी है कि यदि प्रशासन ने इन पारदर्शी मांगों पर ध्यान नहीं दिया, तो वे बाबा विश्वनाथ के न्याय पर भरोसा करेंगे, जो समय आने पर सबको दंड देते हैं।