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Varanasi: 20 साल से सेवा दे रहे एड-हॉक शिक्षकों को हटाने पर हाईकोर्ट सख्त, ठोस आधार जरूरी

अग्रसेन कन्या पीजी कॉलेज वाराणसी मामले में इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा आदेश, फैसला होने तक शिक्षक पद पर रहेंगे, वेतन देना अनिवार्य

 

प्रयागराज/वाराणसी। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने एड-हॉक प्रवक्ताओं को हटाने के मामले में सख्त रुख अपनाते हुए कहा है कि 20 वर्षों से सेवा दे रहे शिक्षकों को केवल वित्तीय संकट या छात्र संख्या घटने का हवाला देकर कार्यमुक्त नहीं किया जा सकता। कॉलेज प्रबंधन को सक्षम प्राधिकारी के सामने ठोस आधार प्रस्तुत करना होगा।

यह आदेश न्यायमूर्ति सौरभ श्याम शमशेरी की एकल पीठ ने वाराणसी के अग्रसेन कन्या पीजी कॉलेज की ओर से दाखिल याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया।

कोर्ट ने क्या कहा

हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि कॉलेज प्रशासन यह साबित करे कि संबंधित शिक्षकों की नियुक्ति स्व-वित्तपोषित योजना के अंतर्गत हुई थी या नहीं, साथ ही यह भी बताए कि हटाए गए शिक्षकों के स्थान पर नई भर्ती की जाएगी या नहीं।
जब तक इन बिंदुओं पर अंतिम निर्णय नहीं हो जाता, सभी शिक्षक अपने पदों पर बने रहेंगे और कॉलेज प्रबंधन को अगले माह का वेतन अनिवार्य रूप से देना होगा।

कॉलेज प्रबंधन ने दी थी चुनौती

अग्रसेन कन्या पीजी कॉलेज की प्रबंध समिति ने उच्च शिक्षा निदेशक और महात्मा गांधी काशी विद्यापीठ के कुलसचिव के आदेश को हाईकोर्ट में चुनौती दी थी। समिति ने एड-हॉक शिक्षकों को हटाने के अपने निर्णय को बरकरार रखने की अनुमति मांगी थी।
कॉलेज प्रबंधन की ओर से दलील दी गई कि वर्ष 1997 से 2014 के बीच हुई नियुक्तियों में सहायक प्रोफेसर पद के लिए निर्धारित विधिक प्रक्रिया का पालन नहीं किया गया था।

हाल ही में किए गए थे बड़े पैमाने पर हटाए गए कर्मचारी

कॉलेज प्रशासन ने हाल के दिनों में 16 अनानुमोदित शिक्षकों, 9 तृतीय श्रेणी कर्मचारियों और 4 चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों को कार्यमुक्त किया था। तृतीय श्रेणी कर्मचारियों को कंप्यूटर ज्ञान की कमी और कार्य में लापरवाही, जबकि चतुर्थ श्रेणी कर्मचारियों को पदों की अधिकता का हवाला देकर हटाया गया।

पीएम मोदी से भी की गई थी हस्तक्षेप की मांग

नौकरी से निकाले गए कर्मचारी जवाहरनगर कॉलोनी (गुरुधाम) स्थित प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय कार्यालय पहुंचे थे। वहां सौंपे गए ज्ञापन में आरोप लगाया गया कि वे 20–25 वर्षों से सेवा दे रहे थे, लेकिन ढाई महीने से वेतन नहीं मिला, जिससे परिवार चलाना मुश्किल हो गया।
कर्मचारियों ने कॉलेज प्रशासन पर वित्तीय अनियमितताओं, बिना टेंडर एजेंसियों से काम कराने, परीक्षा सामग्री महंगे दामों पर छपवाने और छात्र संख्या घटने का दोष शिक्षकों पर मढ़ने जैसे गंभीर आरोप भी लगाए।

आगे क्या?

हाईकोर्ट के आदेश के बाद अब कॉलेज प्रबंधन को सक्षम प्राधिकारी के समक्ष सभी तथ्य रखने होंगे। तब तक शिक्षकों की सेवा बहाल रहेगी और वेतन भुगतान करना अनिवार्य होगा।