UP Election 2027: योगी कैबिनेट विस्तार के पीछे BJP का 'मिशन सोशल इंजीनियरिंग', जानें 2021 वाला पुराना दांव दोबारा क्यों चला?
जातीय समीकरणों की बिसात: जाट, ब्राह्मण और पिछड़ों को साधने के लिए कैबिनेट में दी जगह
लखनऊ: उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव 2027 की आहट के साथ ही राजधानी लखनऊ में सियासी हलचल तेज हो गई है। रविवार को योगी सरकार के बहुप्रतीक्षित कैबिनेट विस्तार ने विपक्ष को चौंका दिया है। चुनाव में अब जब कुछ ही महीने शेष हैं, तब मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने अपनी टीम में 6 नए चेहरों को शामिल किया है और 2 मंत्रियों का कद बढ़ाते हुए उन्हें स्वतंत्र प्रभार की जिम्मेदारी सौंपी है।
पुराने फार्मूले पर नई रणनीति
सियासी गलियारों में यह चर्चा आम है कि आखिर चुनाव से ऐन पहले इस विस्तार की जरूरत क्यों पड़ी? इसका जवाब 2021 के इतिहास में छिपा है। 2022 के चुनावों से ठीक 6 महीने पहले भी भाजपा ने जितिन प्रसाद सहित 7 नए मंत्रियों को शामिल कर अपनी रणनीति साफ कर दी थी। इस बार भी भाजपा ने 'जातिगत समीकरणों' को साधने के लिए वही पुराना दांव चला है, जिसने पिछले चुनाव में उसे सत्ता की दहलीज तक पहुँचाया था।
इन दिग्गजों को मिली कैबिनेट में जगह
इस विस्तार में भाजपा ने हर वर्ग को प्रतिनिधित्व देने की कोशिश की है:
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भूपेंद्र चौधरी: जाट समाज के कद्दावर नेता और यूपी भाजपा अध्यक्ष की सरकार में वापसी हुई है। पश्चिमी यूपी में जाटों को एकजुट करने के लिए भूपेंद्र चौधरी भाजपा का सबसे बड़ा चेहरा हैं।
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मनोज पांडेय: रायबरेली के ऊंचाहार से विधायक और सपा के पूर्व मुख्य सचेतक मनोज पांडेय को कैबिनेट मंत्री बनाकर भाजपा ने ब्राह्मण वोट बैंक में सेंध लगाने की बड़ी चाल चली है।
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पिछड़ा और दलित कार्ड: हंसराज विश्वकर्मा, सुरेंद्र दिलेर, कैलाश राजपूत और कृष्णा पासवान को राज्यमंत्री बनाकर ओबीसी और दलित समाज को बड़ा संदेश दिया गया है।
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प्रमोशन: राज्यमंत्री रहे सोमेंद्र तोमर और अजीत पाल को उनके काम का इनाम देते हुए स्वतंत्र प्रभार बनाया गया है।
विपक्ष के सवालों पर भाजपा का पलटवार
सपा प्रमुख अखिलेश यादव और विपक्षी दल इस विस्तार को चुनाव से पहले की "घबराहट" बता रहे हैं। वहीं, भाजपा के रणनीतिकारों का मानना है कि यह विस्तार केवल पदों का बंटवारा नहीं, बल्कि प्रदेश के सर्वांगीण विकास और सामाजिक न्याय को धरातल पर उतारने की एक कोशिश है।
निष्कर्ष
भाजपा ने इस विस्तार के जरिए न केवल अपने नाराज गुटों को शांत किया है, बल्कि आगामी चुनाव के लिए एक मजबूत किला भी तैयार कर लिया है। अब देखना यह है कि 'भूपेंद्र चौधरी का प्रभाव' और 'मनोज पांडेय का ब्राह्मण कार्ड' 2027 की चुनावी वैतरणी पार कराने में कितना मददगार साबित होता है।