UP Assembly Election: अखिलेश यादव के 'जीत वाले फॉर्मूले' से बढ़ी कांग्रेस की टेंशन, क्या यूपी में बैकफुट पर आएगी देश की सबसे पुरानी पार्टी?
विधानसभा चुनाव से पहले इंडिया गठबंधन में सीटों को लेकर खींचतान शुरू; 'सीट नहीं जीत' के तर्क से सपा ने कांग्रेस पर बनाया मनोवैज्ञानिक दबाव
लखनऊ (भदैनी मिरर डेस्क): उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव में भले ही अभी नौ महीने से अधिक का समय शेष है, लेकिन सूबे की सियासी बिसात पर चालें चली जाने लगी हैं। एक तरफ जहां सत्ताधारी एनडीए (NDA) मंत्रियों और संगठन में फेरबदल कर हैट्रिक लगाने की तैयारी में है, वहीं दूसरी तरफ विपक्षी 'इंडिया' (INDIA) गठबंधन के दो बड़े सहयोगियों— समाजवादी पार्टी (सपा) और कांग्रेस के बीच सीटों को लेकर खींचतान शुरू हो गई है। सपा प्रमुख अखिलेश यादव के एक हालिया बयान और उनके नए फॉर्मूले ने कांग्रेस आलाकमान की धड़कनें बढ़ा दी हैं।
क्या है अखिलेश का 'जीत की क्षमता' वाला फॉर्मूला?
सीटों के बंटवारे को लेकर अखिलेश यादव ने एक नया स्टैंड लेते हुए साफ कहा है कि "बात सीटों की संख्या की नहीं, बल्कि जीत की होनी चाहिए।" सपा प्रमुख का तर्क है कि समाजवादी पार्टी उत्तर प्रदेश के सभी 403 विधानसभा क्षेत्रों में सांगठनिक रूप से बेहद मजबूत स्थिति में है। इसलिए गठबंधन में सीट शेयरिंग का आधार यह होना चाहिए कि किस दल का उम्मीदवार जमीन पर भाजपा (BJP) को शिकस्त देने का दम रखता है।
कांग्रेस को बैकफुट पर धकेलने की रणनीति
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि अखिलेश यादव जमीनी हकीकत से अच्छी तरह वाकिफ हैं। उन्हें पता है कि लोकसभा चुनाव के बेहतर नतीजों के बाद कांग्रेस यूपी में ज्यादा सीटों की डिमांड कर सकती है। इसी दबाव को कम करने के लिए सपा ने यह नया दांव खेला है।
अखिलेश के इस फॉर्मूले से कांग्रेस कई मोर्चों पर बैकफुट पर आती दिख रही है:
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कमजोर सांगठनिक ढांचा: यदि केवल 'जीत की क्षमता' को पैमाना माना जाए, तो यूपी के गिने-चुने विधानसभा क्षेत्रों में ही कांग्रेस का मजबूत कैडर और प्रत्याशी मौजूद हैं। ऐसे में कांग्रेस को बेहद कम सीटों से संतोष करना पड़ सकता है।
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सपा ने मांगी सूची: चर्चा है कि सपा ने कांग्रेस से उन सीटों और जिताऊ दावेदारों की सूची पहले ही मांग ली है, जहां वह चुनाव लड़ने की इच्छा रखती है।
इमरान मसूद ने किया आगाह— 'सीट नहीं होगी, तो जीत कहां से होगी?'
लोकसभा चुनाव के बाद से यूपी कांग्रेस के कार्यकर्ताओं का हौसला बुलंद है और वे सम्मानजनक सीटों पर चुनाव लड़ने के पक्ष में हैं। अगर कांग्रेस नेतृत्व अखिलेश के फॉर्मूले के आगे घुटने टेक देता है, तो कार्यकर्ताओं में निराशा फैल सकती है। इस फॉर्मूले पर कांग्रेस के कद्दावर नेता इमरान मसूद ने भी नेतृत्व को आगाह करते हुए तंज कसा कि "अगर हमारे पास सीट ही नहीं होगी, तो हम जीत कहां से दर्ज करेंगे?"
उपचुनाव का कड़वा अनुभव और अकेले लड़ने का इशारा
कांग्रेस के लिए सपा का यह रुख नया नहीं है। इससे पहले हुए विधानसभा उपचुनावों के दौरान भी अखिलेश यादव ने कांग्रेस को सीटें देने से साफ मना कर दिया था, और कांग्रेस को एकतरफा तौर पर सपा उम्मीदवारों का समर्थन करना पड़ा था।
इसके साथ ही, अखिलेश यादव ने यह भी साफ कर दिया है कि सपा अपने दम पर सभी 403 सीटों पर चुनावी तैयारी कर रही है। इसे कांग्रेस के लिए एक कड़ा संदेश माना जा रहा है कि यदि वह पिछले दरवाजे से मायावती की बसपा या किसी अन्य दल के साथ कोई खिचड़ी पकाने की कोशिश करती है, तो सपा अकेले चुनावी मैदान में उतरने के लिए पूरी तरह सक्षम और तैयार है।
अब देखना दिलचस्प होगा कि कांग्रेस 'इंडिया' गठबंधन की एकजुटता को बरकरार रखते हुए उत्तर प्रदेश में अपने वजूद और राजनीतिक जमीन को कैसे बचा पाती है।