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"हर बार पुलिस की गोली घुटने के ठीक नीचे ही कैसे लगती है?" यूपी पुलिस के हाफ एनकाउंटर पर भड़का हाईकोर्ट, CBI जांच का आदेश

13 पुलिसकर्मी एक ही जीप में और 15 मीटर से सटीक निशाना: कहानी में झोल ही झोल

 

भदैनी मिरर (Bhadaini Mirror) डेस्क: उत्तर प्रदेश में अपराधियों को पकड़ने के नाम पर हो रहे कथित 'हाफ एनकाउंटर' (Half Encounter) को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट की लखनऊ बेंच ने बेहद तल्ख टिप्पणी की है। अदालत ने पुलिस की मुठभेड़ थ्योरी पर गंभीर सवाल उठाते हुए कहा है कि यह देखना काफी अजीब है कि पुलिस की मुठभेड़ में अधिकारियों को एक छर्रा तक नहीं लगता, जबकि आरोपी के ठीक घुटने या उसके नीचे ही गोली लग जाती है।

अदालत ने इसे वरिष्ठ अधिकारियों को खुश करने, आउट ऑफ टर्न प्रमोशन पाने और सोशल मीडिया पर वाहवाही लूटने की 'खतरनाक प्रवृत्ति' करार दिया है। न्यायमूर्ति सुभाष विद्यार्थी की एकल पीठ ने श्रावस्ती जिले में हुई एक संदिग्ध पुलिस मुठभेड़ की जांच केंद्रीय अन्वेषण ब्यूरो (CBI) को सौंपते हुए 3 महीने में रिपोर्ट तलब की है।

13 पुलिसकर्मी एक जीप में और 15 मीटर से सटीक निशाना: कहानी में झोल ही झोल

मामला 12 मई 2025 का है, जब श्रावस्ती के थाना इकौना पुलिस ने छोटकऊ उर्फ अलाउद्दीन को एक 7 वर्षीय बच्ची के अपहरण के मामले में मुठभेड़ के बाद गिरफ्तार दिखाया था। पुलिस का दावा था कि आरोपी के दोनों पैरों में गोली लगी।

सुनवाई के दौरान कोर्ट ने पुलिस की एफआईआर में दर्ज कई हास्यास्पद कमियों को उजागर किया:

  • एक जीप में 13 पुलिसकर्मी: एफआईआर के अनुसार थानाध्यक्ष अश्विनी कुमार दुबे समेत 13 पुलिसकर्मी एक ही सरकारी गाड़ी से गश्त पर थे। कोर्ट ने चुटकी लेते हुए कहा कि जब तक कोई मिनी बस न हो, एसयूवी या जीप में 13 लोग बैठ ही नहीं सकते।

  • 15 मीटर से सटीक निशाना: थानाध्यक्ष ने कोर्ट में दावा किया कि उन्होंने 15 मीटर की दूरी से 9 एमएम सर्विस पिस्टल से रात में केवल हथियार लोड होने की आवाज सुनकर गोलियां चलाईं, जो सीधे आरोपी के दोनों पैरों में जा लगीं। मेडिकल रिपोर्ट और गोली के साइज में अंतर पर अधिकारी की सफाई को कोर्ट ने भ्रामक माना।

  • 23 पुलिसकर्मियों का घेरा फिर भी लाचार: स्वात टीम और थाने के कुल 23 पुलिसकर्मी एक देसी कट्टे से लैस आरोपी को घेरने में नाकाम रहे और बचाव में गोली चलानी पड़ी, इस दावे पर भी कोर्ट ने आश्चर्य व्यक्त किया।

सुप्रीम कोर्ट से बरी होने की चिढ़ में रची कहानी?

हाईकोर्ट ने इस बात पर भी चिंता जताई कि आरोपी को पूर्व में एक अन्य मामले में ट्रायल कोर्ट से फांसी की सजा मिली थी, जिसे हाईकोर्ट ने भी बरकरार रखा था। हालांकि, वर्ष 2023 में सुप्रीम कोर्ट ने उसे दोषमुक्त कर बरी कर दिया था। कोर्ट ने आशंका जताई कि सुप्रीम कोर्ट से आरोपी के बरी होने की चिढ़ में पुलिस ने यह फर्जी एनकाउंटर रचा हो सकता है। हैरान करने वाली बात यह भी रही कि इस संदिग्ध मुठभेड़ के बाद सभी 23 पुलिसकर्मियों को उत्कृष्ट कार्य के लिए पुरस्कृत कर दिया गया था।

CBI अब थानाध्यक्ष की निशानेबाजी की क्षमता की भी तकनीकी जांच करेगी कि क्या रात के अंधेरे में 15 मीटर की दूरी से केवल आवाज सुनकर सर्विस पिस्टल से ऐसा सटीक निशाना संभव है या नहीं।

लापरवाह अधिकारियों को झटका: 124 दिन देरी से दाखिल राज्य सरकार की अपील खारिज

एक अन्य मामले में हाईकोर्ट की मुख्य न्यायाधीश अरुण भंसाली और न्यायमूर्ति जसप्रीत सिंह की खंडपीठ ने सरकारी तंत्र की प्रशासनिक सुस्ती पर कड़ा प्रहार किया है।

सेवानिवृत्त सहायक निरीक्षक सोमराज सिंह से अवैध रूप से वसूले गए ₹83,562 वापस लौटाने के एकल पीठ (19 सितंबर 2024) के आदेश के खिलाफ राज्य सरकार ने 124 दिन की देरी से विशेष अपील दाखिल की थी। सरकार द्वारा देरी के पीछे प्रशासनिक प्रक्रियाओं और विधिक राय का हवाला दिया गया।

अदालत ने सरकार की इस सफाई को खारिज करते हुए कहा, "सरकारी अधिकारी यह सोचते हैं कि उनके पास असीमित समय है। तारीखों का यह घटनाक्रम प्रशासनिक उदासीनता की पुरानी कहानी दर्शाता है। सरकारी तंत्र की लापरवाही को हर बार माफ नहीं किया जा सकता।" इसके साथ ही कोर्ट ने सरकार की अपील को खारिज कर दिया।

निष्कर्ष: हाईकोर्ट के इन सख्त फैसलों से स्पष्ट संदेश गया है कि सजा देने का अधिकार सिर्फ न्यायपालिका के पास है, पुलिस के पास नहीं। साथ ही, अदालती आदेशों के पालन में ढिलाई बरतने वाले प्रशासनिक अधिकारियों की जवाबदेही तय होना अब तय माना जा रहा है।

(डिस्क्लोमर: यह रिपोर्ट अदालती कार्यवाहियों और जारी आदेशों के आधार पर तैयार की गई है।)