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Allahabad High Court: लंबे समय तक सहमति से बना रिश्ता, बाद में शादी न करना अपराध नहीं – हाईकोर्ट

शादी के झूठे वादे पर बने शारीरिक संबंध के मामले में ट्रायल कोर्ट की कार्यवाही रद्द, बीएनएस धारा-69 पर अहम टिप्पणी

 

प्रयागराज, भदैनी मिरर। इलाहाबाद हाईकोर्ट ने शादी के झूठे वादे पर शारीरिक संबंध बनाए जाने से जुड़े मामलों को लेकर एक अहम टिप्पणी की है। अदालत ने स्पष्ट कहा कि यदि दो वयस्क लंबे समय तक सहमति से संबंध में रहते हैं, तो बाद में विवाह न हो पाने मात्र से उसे आपराधिक कृत्य नहीं माना जा सकता।

यह टिप्पणी करते हुए न्यायमूर्ति अवनीश सक्सेना की एकल पीठ ने भारतीय न्याय संहिता (BNS) की धारा-69 के तहत दर्ज एक आपराधिक मामले में ट्रायल कोर्ट में चल रही पूरी कार्यवाही को रद्द कर दिया।


 क्या है पूरा मामला

अलीगढ़ के गांधी पार्क थाना क्षेत्र में जितेंद्र कुमार के खिलाफ वर्ष 2021 में एफआईआर दर्ज की गई थी। आरोप था कि आरोपी ने वर्ष 2014 से 2021 तक शादी का झूठा वादा कर पीड़िता से शारीरिक संबंध बनाए और गर्भपात भी कराया। साथ ही आरोपी के भाई और भाभी पर धमकी देने के आरोप लगाए गए थे।

इसके बाद आरोपियों ने चार्जशीट, संज्ञान आदेश और ट्रायल कोर्ट की पूरी कार्यवाही को रद्द कराने के लिए हाईकोर्ट में याचिका दायर की।


याची और सरकार की दलीलें

याची के अधिवक्ता ने दलील दी कि

  • पीड़िता और आरोपी के बीच कॉलेज के समय से प्रेम संबंध थे। दोनों वयस्क और समझदार हैं। संबंध आपसी सहमति से बने। पीड़िता ने आरोपी से 10 लाख रुपये की मांग की और रुपये न देने पर झूठी एफआईआर दर्ज कराई गई। 
  • वहीं, सरकारी अधिवक्ता और पीड़िता पक्ष ने तर्क दिया कि आरोपी ने शादी का झूठा वादा कर संबंध बनाए, इसलिए मामला अपराध की श्रेणी में आता है।


 हाईकोर्ट की अहम टिप्पणी

हाईकोर्ट ने मामले के तथ्यों और पीड़िता के बयानों का विश्लेषण करते हुए कहा कि युवक और युवती के बीच संबंध 2015-16 से चले आ रहे थे और दोनों के बीच विवाह को लेकर आपसी सहमति भी थी।

अदालत ने कहा कि “प्रारंभिक स्तर पर किया गया विवाह का वादा, जिसे बाद में परिस्थितियों के चलते पूरा नहीं किया जा सका, उसे छल या बुरी नीयत से किया गया झूठा वादा नहीं माना जा सकता।”


सुप्रीम कोर्ट के फैसलों का हवाला

हाईकोर्ट ने सुप्रीम कोर्ट के पूर्व निर्णयों का हवाला देते हुए कहा कि जब दो समझदार वयस्क वर्षों तक सहमति से शारीरिक संबंध में रहते हैं, तो यह माना जाएगा कि संबंध उनकी स्वेच्छा से था।
केवल बाद में विवाह न हो पाने के आधार पर इसे दंडनीय अपराध नहीं ठहराया जा सकता।