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दुष्कर्म और पॉक्सो एक्ट मामले में 20 वर्ष की सजा रद्द, इलाहाबाद हाईकोर्ट ने अभियुक्तों की रिहाई का दिया आदेश 

अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने 16 दिसंबर 2020 को 20 वर्ष कठोर कारावास और 25 हजार रुपये जुर्माने की सुनाई थी सजा 

 

हाई कोर्ट ने कहा कि ट्रायल कोर्ट ने अभियोजन द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों को सही दृष्टिकोण से नहीं परखा 

प्रयागराज। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने दुष्कर्म और पॉक्सो एक्ट के एक मामले में ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई 20 वर्ष की सजा को रद्द कर दिया है। न्यायमूर्ति मनोज बजाज की एकलपीठ ने बरेली जिले के आंवला थाने में दर्ज मामले में आरोपित सूरजपाल और उदयपाल की आपराधिक अपील स्वीकार करते हुए आदेश दिया कि यदि वे किसी अन्य मामले में निरुद्ध नहीं हैं तो उन्हें तत्काल जेल से रिहा किया जाय।

हाई कोर्ट ने निर्णय में कहा कि ट्रायल कोर्ट ने अभियोजन पक्ष द्वारा प्रस्तुत साक्ष्यों को सही दृष्टिकोण से नहीं परखा। रिकॉर्ड पर उपलब्ध साक्ष्य स्वयं गंभीर संदेह उत्पन्न करते हैं और अभियोजन आरोपों को संदेह से परे सिद्ध करने में सफल नहीं हुआ। कोर्ट ने यह भी कहा कि अभियुक्तों द्वारा प्रस्तुत यह बचाव कि शिकायतकर्ता ने उन्हें झूठे आरोप में फंसाया है, परिस्थितियों में संभव प्रतीत होता है। आपराधिक न्याय व्यवस्था के सिद्धांत के अनुसार यदि साक्ष्यों में संदेह उत्पन्न होता है तो उसका लाभ अभियुक्त को दिया जाना चाहिए।

प्रकरण के अनुसार वादी पक्ष का आरोप था कि उसकी 14 वर्षीया पुत्री को आरोपित शराब के नशे में खींचकर धान के खेत में ले गये और सामूहिक दुष्कर्म किया। इस मामले में पुलिस ने धारा 376-डी और 506 तथा पॉक्सो एक्ट की धारा 6 के तहत मुकदमा दर्ज किया गया था। विवेचना के बाद आरोप पत्र कोर्ट में दखिल कर दिया था। अतिरिक्त सत्र न्यायाधीश ने 16 दिसंबर 2020 को दोनों आरोपितों 20 वर्ष के कठोर कारावास और 25 हजार रुपये जुर्माने की सजा सुनाई थी। हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि यदि अभियुक्त किसी अन्य आपराधिक मामले में वांछित या निरुद्ध नहीं हैं तो उन्हें तत्काल जेल से रिहा किया जाय।