मदरसा जमीन विवाद में इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, कहा- 'डीएम-कमिश्नर को नहीं है ऐसी कार्यवाही का अधिकार'
संत कबीर नगर जिला मजिस्ट्रेट का आदेश रद्द; हाईकोर्ट ने कहा- जमीन खरीद को शून्य घोषित करने का कानूनी हक सिर्फ उप-जिलाधिकारी (SDO) को
प्रयागराज (भदैनी मिरर डेस्क): इलाहाबाद हाईकोर्ट (Allahabad High Court) ने उत्तर प्रदेश के संत कबीर नगर जिले में एक मदरसे की जमीन खरीद से जुड़े मामले में बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है। हाईकोर्ट ने स्पष्ट टिप्पणी करते हुए कहा है कि इस मामले में जिला मजिस्ट्रेट (DM) और कमिश्नर को कार्यवाही करने का कोई कानूनी अधिकार नहीं है। इसके साथ ही कोर्ट ने मदरसे की जमीन को राज्य सरकार के अधीन (निहित) करने के डीएम संत कबीर नगर के आदेश को पूरी तरह रद्द कर दिया है।
यह अहम आदेश न्यायमूर्ति अरुण कुमार ने 'कुल्लियातुल बनातिर रजविया एजुकेशनल एंड वेलफेयर सोसाइटी' की याचिका पर सुनवाई करते हुए दिया। हालांकि, अदालत ने राज्य सरकार को इस मामले में कानून के दायरे में रहकर नए सिरे से उचित कार्यवाही करने की छूट दी है।
क्या है पूरा विवाद? क्यों रद्द हुआ डीएम का आदेश?
मामले के अनुसार, संबंधित एजुकेशनल सोसाइटी ने 28 अगस्त 2014 को एक रजिस्टर्ड सेल डीड (बैनामा) के जरिए विवादित जमीन खरीदी थी। यह खरीद सोसाइटी और उसके तत्कालीन सरपरस्त समशुल हुदा खान के पक्ष में हुई थी।
इसके बाद अब्दुल करीम नामक व्यक्ति ने डीएम से शिकायत की कि समशुल हुदा खान साल 2013 में ही ब्रिटिश नागरिक (विदेशी नागरिक) बन चुके थे। यूपी रेवेन्यू कोड 2006 (UP Revenue Code 2006) की धारा 90 और 104 के मुताबिक, राज्य सरकार की पूर्व अनुमति के बिना कोई भी विदेशी नागरिक भारत में अचल संपत्ति नहीं खरीद सकता। शिकायतकर्ता का तर्क था कि यह बिक्री कानूनन शून्य (Void) है, इसलिए इस जमीन को सरकारी घोषित कर राज्य में निहित किया जाए।
डीएम और कमिश्नर का रुख: इस शिकायत पर संज्ञान लेते हुए डीएम संत कबीर नगर ने जमीन को राज्य में निहित करने का आदेश दे दिया। इसके खिलाफ सोसाइटी ने बस्ती कमिश्नर के यहां रिवीजन दाखिल किया। कमिश्नर ने एक बार मामला वापस भेजा, लेकिन डीएम ने दोबारा वही आदेश पारित कर दिया। दोबारा किए गए रिवीजन को कमिश्नर ने भी खारिज कर दिया, जिसके बाद यह मामला हाईकोर्ट पहुंचा।
हाईकोर्ट का कानूनी तर्क: कलेक्टर सुप्रीम हो सकता है, SDO नहीं!
हाईकोर्ट में सोसाइटी की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता जी.के. सिंह ने दलील दी कि यूपी रेवेन्यू कोड 2006 की धारा 104/105 और नियम 103 के तहत यह पूरी कार्यवाही कलेक्टर (डीएम) द्वारा की गई, जबकि कानून के अनुसार यह अधिकार क्षेत्र सिर्फ उप-जिलाधिकारी (SDO/SDM) के पास सुरक्षित है। उन्होंने पूर्व में हुए 'स्मिता मीनू सेठ' और 'सुधीर कुमार जैन' के अदालती फैसलों का हवाला भी दिया।
राज्य सरकार की तरफ से पेश हुए अपर महाधिवक्ता अनूप त्रिवेदी ने भी इन नजीरों को देखने के बाद कोर्ट में यह स्वीकार किया कि कलेक्टर का यह आदेश वास्तव में उनके अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) से बाहर का था।
कानून के तहत सिर्फ एसडीएम को है अधिकार
मामले की गंभीरता को देखते हुए हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया:
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नियम 103(3) की व्याख्या: यूपी रेवेन्यू कोड के नियम 103(3) के तहत किसी भी जमीन की बिक्री को नियम विरुद्ध या शून्य घोषित करने का अधिकार सिर्फ और सिर्फ उप-जिलाधिकारी (SDO) को दिया गया है।
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अधिकारों का अतिक्रमण: कलेक्टर भले ही जिले का सर्वोच्च नियंत्रण प्राधिकारी हो, लेकिन वह उन कार्यों को खुद नहीं कर सकता जो सीधे तौर पर कानूनन एसडीएम को सौंपे गए हैं।
अदालत ने डीएम द्वारा पूर्व में पारित किए गए आदेशों को नियम विरुद्ध पाते हुए रद्द कर दिया और सोसाइटी की याचिका को स्वीकार कर लिया। हालांकि, कोर्ट ने यह भी साफ किया है कि यदि नियमों का उल्लंघन हुआ है, तो राज्य सरकार का संबंधित विभाग कानून सम्मत प्राधिकारी (एसडीएम) के माध्यम से दोबारा विधिक कार्यवाही शुरू करने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र है।