"रघुकुल का सर्वनाश कर दिया पापिन!"... भरत के कारुणिक क्रंदन से सिसक उठी काशी, भावविभोर हुए लीलाप्रेमी
'हे पापिन! कुल का नाश कर दिया...' भरत के उलाहने से सुबक उठी रामनगर की रामलीला, चित्रकूट की ओर बढ़े कदम
भदैनी मिरर सांस्कृतिक डेस्क: धर्मनगरी काशी में खेली जा रही विश्व प्रसिद्ध रामनगर की रामलीला के 11वें दिन सोमवार को त्याग, समर्पण और भातृप्रेम के ऐसे उच्च सामाजिक आदर्श स्थापित हुए, जिसे देख उपस्थित हजारों लीलाप्रेमी भावविभोर हो उठे। जब अपने आराध्य और बड़े भाई श्रीराम को वन भेजने वाली सगी मां कैकेयी को भरत ने धिक्कारा, तो पूरे लीला स्थल पर सन्नाटा छा गया।
लीला के 11वें दिन 'श्री अवध में भरत आगमन', 'श्री भरत का चित्रकूट प्रयाण', 'निषाद मिलन', 'गंगा अवतरण' तथा 'भारद्वाज आश्रम निवास' का सजीव और नयनाभिराम मंचन किया गया।
ननिहाल से लौटे भरत, सूना राजमहल देख उजड़ गई खुशियां
लीला की शुरुआत भरत जी के ननिहाल से अयोध्या लौटने के दृश्य से होती है। भरत के आगमन का समाचार मिलते ही माता कैकेयी आरती की थाल लेकर दौड़ती हैं और उन्हें राजमहल ले जाकर ननिहाल का हाल-चाल पूछती हैं।
किंतु राजमहल में छाई वीरानी और सन्नाटे को देखकर भरत व्याकुल हो उठते हैं। वे माता सीता, श्रीराम और भ्राता लक्ष्मण के बारे में पूछते हैं। तब कैकेयी कुटिल भाव से बताती है कि महाराज दशरथ तो देवलोक सिधार गए और राम को 14 वर्षों के लिए वन जाना पड़ा है, इसलिए अब यह पूरा राजपाठ तुम्हारे हवाले है।
'हे पापिन! कुल का नाश कर दिया...' - कैकेयी पर बरसे भरत
मां के मुख से यह कठोर सत्य सुनते ही भरत जी स्तब्ध रह गए और उनका हृदय क्षोभ व वेदना से भर उठा। वे फूट-फूटकर रो पड़े और कैकेयी को धिक्कारते हुए बोले:
"हे पापिन! तुमने तो पूरे रघुकुल का ही नाश कर दिया। यदि ऐसा ही कुकृत्य करना था तो मुझे जन्म ही क्यों दिया, कोख में ही क्यों नहीं मार डाला?"
इसी बीच जब सज-धजकर कुबरी मंथरा सामने आती है, तो शत्रुघ्न जी का क्रोध सीमा पार कर जाता है। वे मंथरा के बाल पकड़कर खींचने लगते हैं, किंतु दयालु भरत जी बीच-बचाव कर उसे छुड़ा लेते हैं। इसके बाद भरत जी माता कौशल्या के चरणों में बैठकर फूट-फूटकर रुदन करते हैं। माता कौशल्या उन्हें ढांढस बंधाती हैं।
श्रीराम को लौटाने चित्रकूट के लिए प्रस्थान
राजपाठ के मोह को ठुकराकर भरत जी संकल्प लेते हैं कि वे श्रीराम के बिना अयोध्या में नहीं रहेंगे। माताओं और गुरुजनों की आज्ञा लेकर दोनों भाई (भरत-शत्रुघ्न) अयोध्यावासियों के साथ श्रीराम को वापस लाने के लिए प्रस्थान करते हैं।
तमसा और श्रृंगवेरपुर: प्रथम रात्रि तमसा नदी के तट पर विश्राम करने के बाद यात्रा श्रृंगवेरपुर पहुँचती है। जहाँ भरत जी पतित पावनी गंगा जी को नमन करते हैं और निषादराज से भावुक मिलन होता है।
महर्षि भारद्वाज का संबल: इसके पश्चात सभी भारद्वाज आश्रम पहुँचते हैं। महर्षि भारद्वाज भरत जी के भ्रातृप्रेम की सराहना करते हुए कहते हैं— "हे तात! अब अधिक चिंता न करो, श्रीराम जी के चरण कमल का दर्शन पाते ही तुम्हारे सारे दुख और संताप समाप्त हो जाएंगे।"
महर्षि भारद्वाज द्वारा कंदमूल-फल से सभी का आतिथ्य सत्कार करने के बाद संध्याकाल में विश्राम के साथ ही 11वें दिन की लीला को विश्राम दिया गया।