Varanasi: काशी में सबसे अनोखा और दुर्लभ! डोमरी में गंगा से मिले शिवलिंग के अरघे के नीचे दिखा 'नाग', विशेषज्ञों ने किया बड़ा दावा
महारानी अहिल्याबाई के काल का हो सकता है 2 क्विंटल का यह अद्भुत 'नागेश्वर शिवलिंग'; 4 सर्पों की आकृति देख इतिहासकार और श्रद्धालु हैरान।
वाराणसी। धर्म और अध्यात्म की नगरी काशी में गंगा की लहरों ने एक बार फिर सदियों पुराना खगोलीय और ऐतिहासिक रहस्य उगला है। वाराणसी के गंगा पार डोमरी क्षेत्र में मछुआरों के जाल में फंसा लगभग दो क्विंटल (200 किलोग्राम) वजनी एक प्राचीन शिवलिंग इस समय देश के इतिहासकारों, वैज्ञानिकों और सनातनी श्रद्धालुओं के बीच कौतूहल और शोध का केंद्र बन गया है। बीएचयू (BHU) के वरिष्ठ इतिहासकारों और मूर्तिकला विशेषज्ञों का दावा है कि पूरे काशी क्षेत्र में आज तक ऐसा शिवलिंग कहीं नहीं देखा गया, जिसके अरघे के नीचे नाग देव की दुर्लभ आकृति उकेरी गई हो।
मछुआरों के जाल में फंसा 2 क्विंटल का इतिहास
सूजाबाद क्षेत्र के मछुआरे सुनील साहनी, जितेंद्र साहनी, बाबू साहनी, गंगा साहनी और आकाश साहनी गंगा नदी में जाल डालकर मछलियां पकड़ रहे थे। इसी दौरान उनका जाल किसी भारी चीज में उलझ गया। काफी मशक्कत के बाद जब जाल को बाहर खींचा गया, तो उसमें यह विशालकाय शिवलिंग देखकर सभी दंग रह गए।
अगले दिन कन्हैया पहलवान, मुन्ना यादव और लालबाबू निषाद समेत करीब 15 स्थानीय लोगों ने मिलकर इस भारी शिवलिंग को सुरक्षित घाट के गंगा चबूतरे पर स्थापित किया। नमामि गंगे के चंदौली जिला परियोजना अधिकारी दर्शन निषाद ने इसकी सूचना तुरंत स्थानीय प्रशासन को दी।
18वीं शताब्दी और महारानी अहिल्याबाई काल से जुड़ाव!
काशी की संस्कृति एवं भूगोल के विशेषज्ञ व बीएचयू के पूर्व विभागाध्यक्ष प्रो. राणा पी.बी. सिंह ने बताया कि प्रारंभिक बनावट को देखकर यह शिवलिंग कम से कम 18वीं शताब्दी का प्रतीत होता है। संभावना है कि यह इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर के काल का हो। मुगलों के आक्रमण या किसी अन्य विषम परिस्थिति के कारण इसे सुरक्षित रखने के उद्देश्य से गंगा में विसर्जित या छिपा दिया गया होगा।
"तीन या तीन से अधिक नागों वाले शिवलिंग को 'नागेश्वर शिवलिंग' कहा जाता है, जो अत्यंत दुर्लभ हैं। इस शिवलिंग पर चार नाग चार दिशाओं के रक्षक हैं, जबकि अरघे के नीचे बना नाग धरती का बोझ उठाने और उसकी रक्षा का द्योतक है।" — प्रो. राणा पी.बी. सिंह, संस्कृति विशेषज्ञ
शिवलिंग पर कहां-कहां विराजमान हैं चार नाग?
वरिष्ठ इतिहासकार और मूर्तिकलाविद् प्रो. मारूतिनंदन प्रसाद तिवारी के अनुसार, काशी के ललिता घाट और पंचकोशी क्षेत्र में चार नागों वाले शिवलिंग तो हैं, लेकिन अरघे के ठीक नीचे नाग की आकृति वाला यह पहला अनूठा मामला है। शिवलिंग की बनावट इस प्रकार है:
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पहला नाग: अरघे के ठीक नीचे घेरा बनाकर स्थित है, जिसका फन अरघे के अग्र भाग के नीचे है।
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दूसरा नाग: अरघे के अगले हिस्से पर घुमावदार आकृति में बना है।
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तीसरा नाग: शिवलिंग के ठीक निचले हिस्से में लिपटा हुआ है, जिसका फन अरघे की ओर है।
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चौथा नाग: शिवलिंग के शीर्ष पर, अरघे की विपरीत दिशा में सबसे छोटे आकार में उकेरा गया है।
क्या है इसका गहरा आध्यात्मिक महत्व?
धार्मिक मान्यताओं के अनुसार, शिवलिंग पर बने ये चार सर्प कोई साधारण सजावट नहीं हैं। सनातन धर्म में 4 की संख्या का बहुत गहरा महत्व है:
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चार वेद: ये चार सर्प ऋग्वेद, यजुर्वेद, सामवेद और अथर्ववेद का प्रतिनिधित्व करते हैं।
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चार पुरुषार्थ: यह मानव जीवन के चार परम लक्ष्यों— धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष को भी दर्शाते हैं।
काशी प्रदक्षिणा समिति के संचालक उमाशंकर गुप्ता ने बताया कि उन्होंने प्रदक्षिणा यात्राओं के तहत काशी के सभी पौराणिक मंदिरों का 30 से अधिक बार भ्रमण किया है, लेकिन ऐसी दुर्लभ बनावट कहीं नहीं देखी। फिलहाल, इस अद्भुत नागेश्वर शिवलिंग के दर्शन और पूजन के लिए डोमरी घाट पर श्रद्धालुओं का भारी सैलाब उमड़ रहा है और लोग इसे बाबा विश्वनाथ का चमत्कार मान रहे हैं।