{"vars":{"id": "125128:4947"}}

Varanasi Janmashtami: जन्माष्टमी पर काशी में अद्भुत नजारा, जब 'हर' बने 'हरी

महंत आवास में बाबा विश्वनाथ की चल प्रतिमा का 'कुंजबिहारी' स्वरूप में भव्य श्रृंगार; माखन-मिश्री का लगा भोग, 'हर-हर महादेव' और 'हरे कृष्णा' के जयकारों से गूंजी काशी

 

भदैनी मिरर (सांस्कृतिक डेस्क): काशी में जब महादेव मुस्कुराते हैं तो श्रीकृष्ण का स्वरूप दिखाई देता है और कृष्ण की बंसी में भी शिव का अनहद नाद सुनाई देता है। श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के पावन पर्व पर काशी ने केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि 'हर और हरि' के अलौकिक मिलन का साक्षी बना। टेढ़ीनीम स्थित महंत आवास पर बाबा विश्वनाथ की चल प्रतिमा का श्रीकृष्ण के 'हरि' स्वरूप में भव्य श्रृंगार किया गया, जिसे देख श्रद्धालु भावविभोर हो उठे।

त्रिशूलधारी महादेव बने मोरपंखधारी कुंजबिहारी

जन्माष्टमी पर काशीपुराधीश्वर बाबा विश्वनाथ का ऐसा मनोहारी रूप सजा कि मानो कैलाश की विराटता वृंदावन की मधुरता में उतर आई हो। बाबा की चल प्रतिमा को मोरपंखी मुकुट, आकर्षक वस्त्रों और बांसुरी की छवि से सजाया गया।

हाथ में त्रिशूल-डमरू और मस्तक पर मोरपंख धारण कर जब बाबा विश्वनाथ झूले पर विराजे, तो पूरा परिसर भक्तिरस में सराबोर हो गया। शिव की गंभीरता और कृष्ण की वात्सल्यमयी चंचलता का यह एकीकृत रूप देख श्रद्धालुओं की आंखें ठिठक गईं।

माखन-मिश्री का लगा भोग, गूंजे दो महान जयकारे

झूले पर विराजमान बाबा विश्वनाथ को बाल-गोपाल का प्रिय माखन और मिश्री का पारंपरिक भोग अर्पित किया गया। महंत आवास में वात्सल्य और भक्ति का ऐसा संगम हुआ कि पूरा वातावरण 'हर-हर महादेव' और 'हरे कृष्णा' के संयुक्त जयघोष से गूंज उठा।

ब्रह्ममुहूर्त में हुआ विशेष पूजन-अर्चन

महंत वाचस्पति तिवारी ने बताया कि जन्माष्टमी की परंपरा के अनुसार ब्रह्ममुहूर्त में बाबा विश्वनाथ की चल प्रतिमा का विशेष पूजन किया गया। पंडित सुशील त्रिपाठी के आचार्यत्व में वैदिक ब्राह्मणों ने मंत्रोच्चार के साथ विधिवत पूजन-अर्चन संपन्न कराया।

सायंकाल संजीव रत्न मिश्र ने बाबा का 'हरि' स्वरूप में मनोहारी श्रृंगार किया। इसके बाद पारंपरिक लोकगीतों और भजनों के माध्यम से बाबा के चरणों में शिवांजलि अर्पित की गई।

भजनों से भक्तिरस में डूबी काशी

आयोजन के दौरान जयपुर से आए मोहन स्वामी और पागल बाबा की मंडली ने सांस्कृतिक प्रस्तुतियां दीं।

  • "गंगा की तीरे झूला झूलें त्रिपुरारी, बनके आज वो कुंजबिहारी..."

  • "चमके काशी में अजब नजारा, हर बने हरि रूप हमारा..."

इन भजनों की स्वर-लहरियों पर महंत आवास परिसर देर रात तक भक्ति और आनंद के सागर में गोते लगाता रहा।