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रामनगर रामलीला का दूसरा दिन: 'नौमी तिथी मधु मास पुनीता...' चौपाई के साथ गूंजा श्री राम जन्मोत्सव

भगवान अवतरण की लीला का सजीव मंचन; महर्षि वशिष्ठ द्वारा नामकरण और शिक्षा-दीक्षा के प्रसंग पर भावविभोर हुए श्रद्धालु।

 

रामनगर/वाराणसी (भदैनी मिरर): काशी की ऐतिहासिक और आध्यात्मिक धरोहर, विश्वप्रसिद्ध रामनगर की रामलीला के दूसरे दिन रामनगर की पावन धरा पर बिल्कुल वैसा ही कौतूहल और आनंद देखने को मिला, जैसा त्रेतायुग की पावन अयोध्यापुरी में रहा होगा।

परंपरानुसार काशी राज परिवार के मुखिया काशी नरेश की गरिमामयी उपस्थिति के साथ दूसरे दिन 'भगवान अवतरण की लीला' का शुभारंभ हुआ। रामायणी मानस मर्मज्ञों ने जब नारद वाणी में "अवधपुरीं रघुकुलमनि राऊ। बेद बिदित तेहि दसरथ नाऊँ॥" चौपाई का गायन शुरू किया, तो पूरा वातावरण रामभक्ति के अलौकिक रस में डूब गया।

पुत्रकामेष्टि यज्ञ, प्रभु अवतरण और माता कौशल्या का भाव

लीला के दौरान दर्शाया गया कि प्रतापी महाराजा दशरथ संतान न होने के कारण दुखी थे। अपने गुरु महर्षि वशिष्ठ जी की आज्ञा और आशीर्वाद से उन्होंने श्रृंगी ऋषि द्वारा महायज्ञ संपन्न कराया। यज्ञ फल स्वरूप परब्रह्म परमेश्वर अपने अंशों के साथ महारानी कौशल्या, कैकेई और सुमित्रा के गृह में अवतरित हुए।

  • चतुर्भुज रूप का दर्शन: भगवान ने सर्वप्रथम माता कौशल्या को अपने दिव्य चतुर्भुज रूप का दर्शन कराया और उनके पूर्व जन्म (मनु-सतरूपा) के तप का स्मरण कराया।

  • बाल लीला का आग्रह: माता कौशल्या के आग्रह पर प्रभु ने बाल रूप धारण किया। इसके बाद माता कौशल्या से श्रीरामचंद्र जी, महारानी कैकेई से भरत जी तथा महारानी सुमित्रा से लक्ष्मण जी और शत्रुघ्न जी का जन्म हुआ।

महादेव-काकभुशुंडि जी का आगमन और नामकरण प्रसंग

रामचरितमानस की चौपाइयों के बीच लीला में गुप्त रूप से भगवान शिव और काकभुशुंडी जी के मनुष्य रूप धारण कर प्रभु की बाल लीला देखने अयोध्या पहुँचने का अद्भुत मंचन हुआ।

तत्पश्चात महर्षि वशिष्ठ जी द्वारा चारों राजकुमारों के नामकरण का गूढ़ प्रसंग प्रस्तुत किया गया:

  • "जो आनंद सिंधु सुखरासी..." के आधार पर 'राम',

  • "बिस्व भरन पोषन कर जोई..." से 'भरत',

  • "जाके सुमिरन तें रिपु नासा..." से 'शत्रुघ्न', और

  • "लच्छन धाम राम प्रिय..." के भाव से 'लक्ष्मण' नाम रखा गया।

"गुरु गृह गए पढ़न रघुराई, अल्प काल विद्या सब आई"

नामकरण और मनमोहक बाल चरित्र की लीलाओं के पश्चात चारों भाइयों का गुरु वशिष्ठ जी के आश्रम में शिक्षा ग्रहण करने जाने का मंचन हुआ। गोस्वामी तुलसीदास जी के भावों को जीवंत करते हुए दर्शाया गया कि कैसे स्वयं विद्या के सागर प्रभु श्रीराम को अल्प काल में ही समस्त विद्याएं स्वतः ही प्राप्त हो गईं।

शिक्षा पूर्ण कर घर लौटने के बाद चारों भाइयों द्वारा अपने सखाओं के साथ दिन-प्रतिदिन की जाने वाली लीलाओं और क्रीड़ा को देखकर समस्त अयोध्यावासी कृतार्थ होते रहे।

आरती संग विश्राम

लीला के दूसरे दिन के प्रसंग का विश्राम माता कौशल्या द्वारा प्रभु श्रीराम की उतारी गई दिव्य आरती और श्रद्धालुओं के जयकारों के साथ हुआ। 'जय श्री सीता राम' और 'हर-हर महादेव' के उद्घोष से पूरा रामनगर गूंज उठा।