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Ramnagar Ramlila: रामनगर रामलीला में बीसवें दिन हुई विभीषण शरणागति और सेतु निर्माण की लीला

'भय बिनु होइ न प्रीति'— प्रभु श्री राम के कोप पर प्रकट हुए समुद्र देव; नल-नील ने बाँधा सेतु, काशी की विश्वप्रसिद्ध रामलीला में गूंजा 'जय श्री राम' का जयघोष।

 

भदैनी मिरर संस्कृति डेस्क: वाराणसी की विश्वप्रसिद्ध और ऐतिहासिक रामनगर रामलीला के बीसवें दिन विभीषण शरणागति, समुद्र पर सेतु निर्माण तथा भगवान श्री राम द्वारा श्री रामेश्वरम शिवलिंग की स्थापना की भावपूर्ण लीला का मंचन किया गया। अध्यात्म और सनातन संस्कृति के इस अद्भुत उत्सव को देखने के लिए बड़ी संख्या में श्रद्धालु और साधु-संत रामनगर पहुँचे, जिससे पूरा लीला परिसर 'जय श्री राम' और 'हर-हर महादेव' के जयघोष से गुंजायमान रहा।

मंदोदरी और विभीषण का रावण को परामर्श

लीला की शुरुआत में प्रभु श्री राम वानर सेना के साथ समुद्र तट पर पहुँचते हैं। यह समाचार सुनते ही महारानी मंदोदरी रावण को श्री राम की शरण में जाने और सीता जी को सम्मान सहित लौटाने का परामर्श देती हैं, किंतु रावण अपनी हंसी में इसे उड़ा देता है।

इसके बाद राजदरबार में विभीषण जी रावण को धर्म नीति और नीति-अनीति का बोध कराते हुए समझाने का प्रयास करते हैं। किंतु अहंकार में अंधा रावण विभीषण का अपमान कर उन्हें लंका से निष्कासित कर देता है। तुलसीदास जी के शब्दों में— *'असकहि चला बिभीषनु जबहीं। आयू हीन भए सब तबही' अर्थात विभीषण के प्रस्थान करते ही लंका का भाग्य और आयु समाप्त हो जाती है।

प्रभु राम ने किया विभीषण का राज्याभिषेक

रावण के दरबार से निकलकर विभीषण जी प्रभु श्री राम की शरण में पहुँचते हैं। हनुमान जी और अंगद जी उन्हें प्रभु के समक्ष प्रस्तुत करते हैं। विभीषण जी प्रभु के दर्शन कर भाव-विभोर हो जाते हैं। दयालु श्री राम अत्यंत आदर के साथ उन्हें 'लंकेश' कहकर पुकारते हैं और समुद्र जल से उनका राज्याभिषेक कर देते हैं।

'भय बिनु होइ न प्रीति'— प्रकट हुए समुद्र देव

समुद्र पार करने का उपाय पूछने पर विभीषण जी समुद्र देव के पूजन का सुझाव देते हैं। प्रभु श्री राम तीन दिनों तक तट पर बैठकर विनय करते हैं। जब जलधि (समुद्र) कोई मार्ग नहीं देता, तब प्रभु श्री राम कोपयुक्त होकर बाण संभालते हैं—

“विनय न मानत जलधि जड़ गए तीनि दिन बीति। बोले राम सकोप तब भय बिनु होइ न प्रीति॥”

प्रभु के क्रोधित होते ही समुद्र देव प्रकट होते हैं और क्षमा याचना करते हुए नल और नील के माध्यम से समुद्र पर सेतु (पुल) निर्माण की युक्ति बताते हैं।

सेतु निर्माण और श्री रामेश्वरम स्थापना

नल और नील के नेतृत्व में समस्त वानर-भालू सेना 'राम' नाम अंकित पत्थरों से समुद्र पर विशाल सेतु का निर्माण शुरू करती है। इसी दौरान प्रभु श्री राम समुद्र तट पर भगवान शिव के शिवलिंग की स्थापना करते हैं और उनका नाम 'रामेश्वर' रखकर शिव भक्ति की महिमा का गुणगान करते हैं।

सेतु का कार्य पूर्ण होने के साथ ही आज की लीला को विश्राम दिया गया। लीला के अंत में विभीषण जी ने प्रभु श्री राम की महाआरती उतारी।