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Ramnagar Ramlila Day 9: रामनगर की विश्वविख्यात रामलीला के 9वें दिन वन गमन, निषादराज मिलन और लक्ष्मण-गीता उपदेश का मार्मिक मंचन

वाराणसी के रामनगर में सिया-राम और लखन के वन गमन का प्रसंग देख भावुक हुए श्रद्धालु; जानें क्यों इस ऐतिहासिक रामलीला में कभी नहीं होता 'दशरथ मरण' का मंचन।

 

वाराणसी/रामनगर (भदैनी मिरर): धर्मनगरी काशी की पावन धरा पर जब विश्वविख्यात 'रामनगर की रामलीला' का मंचन होता है, तो वह केवल एक अभिनय नहीं बल्कि सनातन संस्कृति और आस्था का जीवंत दस्तावेज बन जाता है। शनिवार को 236 वर्ष पुरानी इस ऐतिहासिक रामलीला के नौवें दिन का मंचन बेहद भावुक और मार्मिक रहा, जिसने मैदान में मौजूद हज़ारों लीला प्रेमियों को अध्यात्म, त्याग और मर्यादा के उस युग में पहुँचा दिया जहाँ रिश्ते और कर्तव्य ही सर्वोपरि थे।

नौवें दिन की लीला का प्रसंग माता कौशल्या के रनिवास से शुरू होकर राम वन गमन, अयोध्यावासियों का विलाप, निषादराज मिलन और लक्ष्मण-कृत गीता उपदेश के अत्यंत भावपूर्ण अध्यायों पर केंद्रित रहा।

"जहाँ सिया-राम, वही अयोध्या": वन जाने के हठ पर अड़े माता सीता और लखनलाल

लीला की शुरुआत माता कौशल्या के रनिवास से हुई, जहाँ श्रीराम मुनि वेश धारण कर माता से आज्ञा लेने पहुँचते हैं। माता कौशल्या के समझाने पर भी जब माता सीता अपने पतिव्रता धर्म को निभाते हुए वन जाने का हठ करती हैं, तो वे कहती हैं कि "संसार के समस्त नाते पति के चरणों से बढ़कर नहीं हैं, आप जहाँ रहेंगे वही मेरी अयोध्या है।"

तभी अनुज लक्ष्मण दौड़ते हुए पहुँचते हैं और भावुक होकर श्रीराम के चरणों में गिर पड़ते हैं। लक्ष्मण जी कहते हैं— "हे रघुनाथ! मैं तो आपका दास हूँ, माता-पिता-गुरु सब आप ही हैं, कृपा कर मुझे अपने साथ ले चलें।" लक्ष्मण का अटूट प्रेम देखकर श्रीराम उन्हें माता सुमित्रा से आज्ञा लेने भेजते हैं। माता सुमित्रा सहर्ष आज्ञा देते हुए कहती हैं कि "तुम्हारे भाग्य से ही राम वन जा रहे हैं, जहाँ राम और सीता हैं वही असली अयोध्या है।"

तमसा तट से प्रस्थान और निषादराज मिलन

चीर वस्त्र धारण कर जब श्रीराम, सीता और लक्ष्मण गुरु वशिष्ठ और पिता दशरथ से विदाई लेकर सुमंत जी के साथ रथ पर सवार हुए, तो पूरा जनसैलाब और शोकाकुल अयोध्यावासी रथ के पीछे दौड़ पड़े। तमसा नदी के तट पर पहली रात गुजारने के बाद, भोर में श्रीराम ने सुमंत जी को रथ इस तरह चलाने को कहा जिससे पहियों के निशान न दिखें और अयोध्यावासी भ्रमित होकर वापस लौट जाएँ।

तत्पश्चात, श्रृंगवेरपुर पहुँचने पर प्रभु श्रीराम का मिलन अपने परम मित्र निषादराज से हुआ। निषादराज ने भावुक होकर प्रभु को सीने से लगाया और कंदमूल-फल भेंट किए। श्रीराम ने नगर जाने के बजाय सिंसुपा वृक्ष (शीशम) के नीचे कुशा की शैय्या पर विश्राम किया।

लक्ष्मण जी ने दिया 'गीता उपदेश', गूँज उठे जयकारे

रात के समय जब निषादराज ने देखा कि तीनों लोकों के स्वामी कुशा की शैय्या पर सो रहे हैं और लक्ष्मण जी हाथ में धनुष-बाण लिए पहरेदारी कर रहे हैं, तो वे रो पड़े और कैकेयी को दोष देने लगे।

तब लक्ष्मण जी ने निषादराज को ढांढस बंधाते हुए ज्ञान, वैराग्य और भक्ति रस से सनी मीठी वाणी में जो उपदेश दिया, वह रामचरितमानस में 'लक्ष्मण-गीता' के नाम से प्रसिद्ध है:

"बोले लखन मधुर मृदु बानी। ग्यान बिराग भगति रस सानी॥

काहु न कोउ सुख दुख कर दाता। निज कृत करम भोग सबु भ्राता॥"

लक्ष्मण जी ने समझाया कि "हे भाई! संसार में कोई किसी के सुख-दुख का दाता नहीं है, सब अपने कर्मों का फल भोगते हैं। यह संसार मोह-रूपी रात्रि का स्वप्न मात्र है। जो यहाँ सो रहे हैं, वे साक्षात परमपिता परमेश्वर हैं जो संतों के कल्याण के लिए यह लीला कर रहे हैं।" लक्ष्मण जी के इन ज्ञानवचनों को सुनकर पूरा लीला प्रांगण जयकारों से गूँज उठा। इसके बाद निषादराज द्वारा प्रभु की संगीतमय आरती के साथ नौवें दिन की कथा को विराम दिया गया।

रामनगर रामलीला का एक अनूठा रहस्य: कभी नहीं होता 'दशरथ मरण' का मंचन

रामनगर की इस ऐतिहासिक रामलीला से जुड़ा एक ऐसा अद्भुत रहस्य और परंपरा है जो इसे दुनिया भर में अनूठा बनाती है। यहाँ कभी भी 'दशरथ मरण' के प्रसंग का मंचन नहीं किया जाता।

राम, सीता और लक्ष्मण के चित्रकूट निवास और मंत्री सुमंत की खाली रथ लेकर अयोध्या वापसी के साथ ही लीला रोक दी जाती है। आधिकारिक रामलीला सूची में भी वह स्थान रिक्त रखा जाता है। किंवदंती है कि तत्कालीन काशी नरेश की अत्यंत संवेदनशीलता और पूर्वजों की भावनाओं का आदर करते हुए राजा दशरथ के निधन के शोक संतप्त प्रसंग का मंचन वर्जित कर दिया गया था, और आज भी इस परंपरा का उतनी ही पवित्रता और निष्ठा से पालन किया जाता है।