Ramnagar Ramlila 2026: रामनगर रामलीला के 22वें दिन मंचित हुई 'चारों फाटक की लड़ाई' और 'लक्ष्मण शक्ति' की मर्मस्पर्शी लीला
हनुमान जी द्वारा संजीवनी बूटी लाना और भरत-हनुमान मिलन के प्रसंग ने किया दर्शकों को भावुक
वाराणसी (भदैनी मिरर): विश्व प्रसिद्ध रामनगर की रामलीला के 22वें दिन शुक्रवार को लीला का मंचन बेहद रोमांचक और भावुक करने वाला रहा। आज के प्रसंग में 'चारों फाटक की लड़ाई' और 'लक्ष्मण शक्ति' की लीला का जीवंत मंचन किया गया, जिसे देखने के लिए भारी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे।
लंका के चारों द्वारों पर वानर सेना का आक्रमण
लीला की शुरुआत में भगवान श्रीराम, विभीषण और वानर सेना लंका के चारों फाटकों को ध्वस्त करने की योजना बनाते हैं। जामवंत जी की युद्धनीति के अनुसार:
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पश्चिम द्वार: हनुमान जी
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पूर्व द्वार: नल और नील
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दक्षिण द्वार: अंगद जी
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उत्तर द्वार: स्वयं जामवंत जी
पूरी वानर सेना भगवान श्रीराम, लक्ष्मण और महाराज सुग्रीव का जयकारा लगाते हुए लंका के सभी फाटकों को ध्वस्त कर देती है। युद्ध के बाद वानर सेना भगवान श्रीराम के पास पहुंचकर विजय का वृतांत सुनाती है।
मेघनाद और लक्ष्मण के बीच घमासान युद्ध
उधर, रावण के सभागार में माल्यवंत के समझाने के बाद भी जब रावण अपनी जिद नहीं छोड़ता, तब उसका पुत्र मेघनाद युद्ध के मैदान में उतरता है। मेघनाद और लक्ष्मण जी के बीच अत्यंत भयंकर युद्ध होता है। युद्ध के दौरान मेघनाद अपनी माया और ब्रह्मस्त्र शक्ति का प्रयोग कर लक्ष्मण जी को मूर्छित कर देता है।
जब मेघनाद लक्ष्मण जी को उठाने का प्रयास करता है, तो वह सफल नहीं होता। तब संकटमोचन हनुमान जी आगे आते हैं और लक्ष्मण जी को उठाकर श्रीराम के पास ले जाते हैं। भाई की ऐसी स्थिति देखकर भगवान श्रीराम विलाप करने लगते हैं।
संजीवनी बूटी और भरत-हनुमान मिलन
जामवंत जी के कहने पर हनुमान जी वैद्य सुषेण को उनके घर सहित ले आते हैं। सुषेण जी धौलागिरी पर्वत से संजीवनी बूटी लाने का परामर्श देते हैं। रावण अपने मामा कालनेमी को हनुमान जी का रास्ता रोकने के लिए भेजता है, लेकिन हनुमान जी उसका वध कर आगे बढ़ते हैं।
धौलागिरी पर्वत से संजीवनी बूटी लेकर लौटते समय अयोध्या के ऊपर से गुजरने पर भरत जी उन्हें दानव समझकर बिना फर के बाण से घायल कर देते हैं। जब हनुमान जी के मुख से 'राम-राम' का नाम सुनता है, तो भरत जी को अपार दुख होता है। इसके बाद भरत जी के अनुरोध पर हनुमान जी उनके बाण पर बैठकर क्षणभर में भगवान श्रीराम के पास पहुंच जाते हैं।
लक्ष्मण जी का पुनरुत्थान और आरती
संजीवनी बूटी मिलते ही लक्ष्मण जी की मूर्छा टूट जाती है और वे उठ बैठते हैं। यह देख भगवान श्रीराम उन्हें गले से लगा लेते हैं और पूरी वानर सेना में हर्ष की लहर दौड़ जाती है। इसके पश्चात लीला रणभूमि से सुबेल गिरी पर्वत पर पहुंचती है, जहां विभीषण जी द्वारा भगवान की आरती के साथ आज की लीला का विश्राम होता है।