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काशी विश्वनाथ धाम में भक्ति-संगीत से गूंजा शिवार्चनम् मंच, श्रद्धालुओं की उमड़ी भीड़

शिवार्चनम् मंच पर बांसुरी वादन, भजन, शास्त्रीय नृत्य और सांस्कृतिक प्रस्तुतियों ने बांधा समां; धाम परिसर में दिव्य आध्यात्मिक ऊर्जा का संचार—श्रद्धालुओं ने भाव-विभोर होकर लिया आनंद।

 

वाराणसी। चैत्र नवरात्रि 2026 के तृतीय दिवस पर शुक्रवार को श्री काशी विश्वनाथ धाम में भक्ति, संगीत और आध्यात्मिक उल्लास का अद्भुत संगम देखने को मिला। शिवार्चनम् मंच पर आयोजित सांस्कृतिक संध्या ने पूरे धाम परिसर को दिव्यता, ऊर्जा और भक्ति से सराबोर कर दिया। नवरात्रि के पावन पर्व पर आयोजित यह संध्या श्रद्धालुओं के लिए एक अविस्मरणीय आध्यात्मिक अनुभव बनी।

धाम परिसर माँ भगवती की आराधना में निमग्न रहा और चारों ओर भक्ति-भाव से ओतप्रोत संगीत गूंजता रहा। बड़ी संख्या में पहुंचे भक्तों ने कार्यक्रम में भावनात्मक रूप से जुड़कर आध्यात्मिक रस का आनंद लिया।

श्रेष्ठ कलाकारों की प्रस्तुतियों ने मोहा मन

कार्यक्रम में ख्यातिलब्ध कलाकारों ने मंच पर एक से बढ़कर एक मनमोहक प्रस्तुतियाँ दीं—

  • डॉ. राकेश कुमार ने अपने मधुर बांसुरी वादन से वातावरण को सुरमयी बना दिया।
  • विदुषी सुचारिता गुप्ता द्वारा सुरीले भजन गायन ने श्रद्धा का भाव और गहरा कर दिया।
  • श्री राहुल मुखर्जी एवं दल ने सांस्कृतिक नृत्य प्रस्तुत कर दर्शकों को मंत्रमुग्ध किया।
  • पं. रविशंकर और डॉ. ममता टंडन के शास्त्रीय नृत्य ने मंच की गरिमा को और अधिक ऊँचा किया।

इन सभी प्रस्तुतियों ने उपस्थित श्रद्धालुओं को भक्ति-रस में डुबो दिया और धाम परिसर में आध्यात्मिक ऊर्जा का विलक्षण संचार हुआ।

व्यवस्थाओं में अनुशासन, स्वच्छता और सुरक्षा का बेहतरीन समन्वय

आयोजन के दौरान मंदिर प्रशासन और न्यास द्वारा समस्त व्यवस्थाएँ सुव्यवस्थित रूप से सुनिश्चित की गईं।

  • परिसर में सुरक्षा के कड़े इंतजाम,
  • स्वच्छता व्यवस्था,
  • एवं श्रद्धालुओं की सहज आवाजाही के लिए पर्याप्त प्रबंधन किया गया।

इन व्यवस्थाओं के कारण पूरा कार्यक्रम शांतिपूर्ण, गरिमामय और अनुशासित तरीके से संपन्न हुआ।

सनातन संस्कृति के संरक्षण का निरंतर प्रयास

मंदिर न्यास ने कहा कि ऐसे आयोजन सनातन संस्कृति, भारतीय आध्यात्मिक परंपराओं और सांस्कृतिक धरोहर के संरक्षण और संवर्धन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
चैत्र नवरात्रि की यह सांस्कृतिक संध्या श्रद्धा, भक्ति और सांस्कृतिक चेतना का एक दिव्य एवं स्मरणीय प्रतीक बन गई।